कहीं बढ़ तो नहीं रहा आपका वजन, वो भी डाइट कंट्रोल और वर्कआउट के बाद भी…?


कहीं बढ़ तो नहीं रहा आपका वजन, वो भी डाइट कंट्रोल और वर्कआउट के बाद भी…? कई बार हम देखते हैं कि जब हमारा वजन यदि एक बार बढ़ जाये तो हम चाहे लाख यत्न कर लें, वो बजाय कम होने के, लगातार बढ़ता जाता है। कई बार तो आजीवन संघर्ष ही करते जाते हैं। इसमें वो डाइटिशियन से भी मिलकर, डाइट

चार्ट का कड़ाई से पालन करने के बाद भी वजन कम होने का नाम नहीं लेता। ऐसा क्यों होता है ? मेयो क्लिनिक की एक स्टडी में ताजा रिपोर्ट के बाद ऐसा इसीलिए होता है, इससे ग्रस्त मोटापे के रोगी सारे यत्न करने के बाद रात को भरपूर नींद नहीं लेते। एक ब्यस्क ब्यक्ति के लिए कम से कम ७ से ८ घंटे की नींद न लेने से ही वजन कम नहीं होता।

हमारे शरीर में वजन से रिलेटेड हार्मोन्स के लेवल का बिगड़ना, मुख्य कारण है। जो हमारी भूख को नियंत्रण में रखने  का काम करते हैं। नींद की कमी के कारण के कारण इन हार्मोन्स के स्तर में गड़बड़ी होने लगती है। जिससे हमारे शरीर का वजन बढ़ने  लगता है। इनमें सबसे अहम है, घ्रेलिन हार्मोन।  इसे हम हंगर हार्मोन भी कहते हैं। यही हार्मोन अपने नाम के अनुसार हमारी भूख को बढ़ाने का काम  करता है। नींद की कमी के कारण हमारे  शरीर में इस हार्मोन का स्तर

भी बढ़ने लगता हे। और इसी कारण हम अधिक भूख महसूस करने लगते हैं। इसी से हम ज्यादा खाने  लगते हैं, और हमारा वजन बढ़ने  लगता है।

ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर में लेप्टिन नामक हार्मोन होता है, जो ‘सटायटी हार्मोन कहलाता है। जो हमारी भूख को शांत करने और शरीर को ऊर्जा को खर्च करने में मदद करता है। लेकिन नींद की कमी के कारण इस हार्मोन का उत्पादन कम होता है।  और इस हार्मोन की कमी के कारण हमें भूख ज्यादा महसूस होती है। जिस कारण हम ज्यादा खाते हैं, और वजन भी बढ़ता है।

नींद के कारण हमारे दिमाग में हाई कैलोरी फ़ूड के लिए अधिक क्रेविंग होती है। एक स्टडी के अनुसार अगर हमारी नींद ठीक से नहीं हो पा रही है, तो हम अमूमन ३०० कैलोरी का ज्यादा सेवन करते हैं। स्टडी के अनुसार यदि एक सप्ताह तक प्रतिदिन हमारी नींद ५ घंटे तक ही होती है, तो इस एक सप्ताह में आपका वजन लगभग ९०० ग्राम तक बढ़ सकता है।

अमेरिकन जर्नल ऑफ़ ह्यूमन बॉयोलॉजी के अनुसार नींद की कमी के कारण वजन बढ़ने के साथ -साथ डॉयबिटीज, ब्लड प्रेशर और ह्रदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।

कुछ जरूरी टिप्स नींद आने के लिए :

सोने से पहले कैफीन युक्त पदार्थ जैसे चाय, कॉफ़ी ये नशीले पदार्थों का सेवन बिलकुल न करें। एक्सरसाइज या फिजिकल एक्टिविटी करने से नींद की क्वालिटी अच्छी होती है।  लेकिन सोने से तुरंत पहले एक्सरसाइज न करें।

सोने से तुरंत पहले ज्यादा गरिष्ट भोजन लेने से एसिडिटी, गैस और रिफ्लक्स की प्रॉब्लम हो सकती है, जिससे आपकी नींद खराब हो सकती है।

Nirjala Ekadashi


Today is the Ekadashi of the Jyeshta month, it is a pleasant

coincidence, that today Lord Vishnu’s day is Thursday, like

banana isolated

Guruvar is. In today’s temple, there is a tradition

of give the water pitcher, fan

and fruits to the poor class. Today at

Guruvar .

On the day of day, it is the virtue of donating bananas in fruit. Therefore, according to your reverence you must donate with your hand fan( Pankhi )

निर्जला एकादशी


आज ज्येष्ठ मास की एकादशी है, ये एक सुखद संयोग है, कि आज भगवान

विष्णु जी का दिन गुरुवार है। आज के दिन मंदिरोंव में, गरीब वर्ग में पानी का

घड़ा, पंखा और फल देने की

banana isolated

परम्परा है। आज गुरुवार के दिन

फल में केले दान करने का पुण्य मिलता है। अतः अपनी श्रद्धा

अनुसार अपने हाथ से दान अवश्य


करें।

Talks of some kitchen every day …


Many times, despite our efforts, the daily necessities of the kitchen such as spices, gravy etc. If the ingredients that are inserted in the end are expired, then it is imperative to be free, if guests if something is going to happen, then what to say, to be done with a little wisely, and the second option if you think about the work done, then it may be that you do not have any

kind of embarrassment and trouble only survive, but the taste of whatever you are making can also be successful.

Let’s pay attention to some urgent tips.

1 .. Magical: The melon, watermelon, pumpkin and cucumber seeds are called four mugs. They are usually used in gravy is used to thicken. apart from this, they also have a taste for sweet, halva etc. Is used. if it is not available at the time, then instead of peanut i.e. groundnut seeds can use it. also in sweet dishes, peanut seeds can be used in small pieces.

There will not be any difference in your taste.

2 .. Tamarind: Sour can use tamarind in sweet sauce, lady dish, pumpkin pudding, Sambhar etc. if not tamarind, Then Amchur can use it in his place. There will also be no difference in your taste. yes if you are using 30 grams tamarind, instead of using 50 gram amchoor.

3. Tomato: Tomato puree is put in some vegetables to make gravy. If it is not present in the kitchen, then tomato instead of Pumpkin pyuree can be put in place. Yes, if you want 1 kilogram of tomato puree, then replace it with 500 grams puree is a lot of puri.

4 .. Black pepper: If you do not have black pepper, you can use it in its place. A teaspoon black pepper Use two small spoon long instead. The same sharpness of black pepper will remain. The taste will also remain intact.

5 .. Amchoor: If you do not want to add amchoor in the word, then grind it and add it in the experiment. remember If you have to take 50 grams of pomegranate powder instead of 20 grams of amchoor.

Options of spices:

It is so often that spices are not present in the kitchen when making gram or sambhar. In this way you roast the ingredients

after grinding can be prepared.

Masala of gram or chickpeas – 10 teaspoons standing coriander, 2 teaspoons of pomegranate, 3,4 small pieces of cinnamon,

Mix 3 teaspoons of cardamom seeds, 1 teaspoon long, a teaspoon black salt, grind it.

Chat masala – For this, 10 small spoons of coriander, 4 teaspoons cumin seeds, 2 teaspoons amchoor, and a small-spoon black salt grinding.

Sambhar Powder – a small cardboard, 3 small spoonful coriander, 8 steep red chillies, 2 teaspoons of grinding of mustard prepare

Mix 3 teaspoons of cardamom seeds, 1 teaspoon long, a teaspoon black salt, grind it.

Pavbhaji masala – 10 small spoons of coriander, 4 teaspoons cumin seeds, 2 large cardamom, 5,6 pieces of cinnamon,

1 teaspoon celery, 2,3 vertical turmeric, 1 teaspoon dry powder.

रोजमर्रा की कुछ किचन की बातें…


कई बार हमारे कितना भी प्रयास करने के बाद भी किचन में रोजमर्रा की जरूरी चीजें जैसे कि मसाले, ग्रेवी आदि में डालने वाली सामग्री यदि एन मौके पर समाप्त हो जाती हैं, तो कोफ़्त होना लाजिमी है, अगर मेहमानों के लिए कुछ बन रहा हो तो, फिर तो क्या कहने, ऐसे में थोड़ी समझदारी से काम लिया जाये, और दूसरे ऑप्शन के बारे में बारे में सोचकर काम किया जाये, तो हो सकता है, कि आप किसी तरह की शर्मिंदगी व परेशानी से न केवल बच सकती हैं, बल्कि

जो भी आप बना रही हैं, उसका स्वाद भी वही बरकरार रखने में कामयाब हो सकती हैं।

आइये कुछ जरूरी टिप्स पर ध्यान देते हैं।

१.. मगज : खरबूजे, तरबूज, कद्दू और खीरे के बीजों को चार मगज कहते हैं। इनका इस्तेमाल आमतौर पर ग्रेवी को गाढ़ा करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा मिठाई, हलवे आदि ब्यंजनों में भी स्वाद बढ़ाने में इनका इस्तेमाल किया जाता है। यदि ये समय पर उपलब्ध नहीं है, तो इनकी जगह पीनट यानी की मूंगफली के बीजों को इस्तेमाल कर सकती हैं। साथ ही मीठे ब्यंजनों में भी

मूंगफली के बीजों को छोटे टुकड़ों में उपयोग कर सकते हैं। आपके स्वाद में कोई भी फर्क नहीं पड़ेगा।

२.. इमली : खट्टी मीठी चटनी, भिंडी, कद्दू की शब्जी, सांभर आदि में इमली का प्रयोग कर सकती हैं, यदि इमली नहीं है, तो अमचूर को उसकी जगह इस्तेमाल कर सकती हैं। आपके स्वाद में भी कोई फर्क नहीं महसूस होगा। हाँ यदि आप ३० ग्राम इमली प्रयोग कर रहे हैं, उसकी जगह ५० ग्राम अमचूर इस्तेमाल करें।

३.. टमाटर : कुछ शब्जियों में ग्रेवी बनाने में टमाटर प्यूरी  डाली जाती है। यदि ये किचन में मौजूद नहीं है, तो टमाटर की जगह कद्दू की प्यूरी डाल सकती हैं। हाँ यहां ध्यान रहे यदि १ किलो टमाटर की प्यूरी चहिये, तो उसकी जगह ५०० ग्राम कद्दू की प्यूरी बहुत है।

४.. काली मिर्च : काली मिर्च न होने पर आप उसकी जगह लोंग का उपयोग कर सकती हैं। एक छोटा चम्मच काली मिर्च की जगह दो छोटे चम्मच लोंग का इस्तेमाल करें। काली मिर्च का वही तीखापन बना रहेगा। स्वाद भी बरकरार रहेगा।

५.. अमचूर : शब्जी में अमचूर डालने के लिए यदि नहीं है, तो इसकी जगह अनारदाने को पीसकर प्रयोग में लाएं। याद रहे यदि आप २० ग्राम अमचूर की जगह ५० ग्राम अनारदाना पाउडर लेना होगा।

मसालों के भी ऑप्शन :

ऐसा अक्सर होता है कि चने या सांभर बनाते समय मसाले किचन में मौजूद नहीं होते। ऐसे में आप सामग्रियों को भुनने के बाद पीसकर तैयार कर सकते हैं।

चना या छोले का मसाला — १० छोटे चम्मच खड़ा धनिया, २ छोटे चम्मच अनारदाना, ३,४ दालचीनी के छोटे टुकड़े, ३ छोटे चम्मच इलायची दाना, १ छोटा चम्मच लोंग, एक छोटा चम्मच काला नमक,पीसकर मिलाएं।

चाट मसाला — इसके लिए १० छोटे चम्मच खड़ा धनिया, ४ छोटे चम्मच जीरा, २ छोटे चम्मच अमचूर, और एक छोटा चम्मच काला नमक पीसें।

सांभर पाउडर — एक छोटा कड़ी पत्ता, ३ छोटे चम्मच खड़ा धनिया, ८ खड़ी लाल मिर्च, २ छोटे चम्मच राई को पीसकर तैयार करें।

३ छोटे चम्मच इलायची दाना, १ छोटा चम्मच लोंग, एक छोटा चम्मच काला नमक,पीसकर मिलाएं। पावभाजी मसाला — १० छोटे चम्मच खड़ा धनिया, ४ छोटे चम्मच जीरा, २ बड़ी इलायची, ५,६ दालचीनी के टुकड़े,

१ छोटा चम्मच अजवाइन, २,३ खड़ी हल्दी, १ छोटा चम्मच सोंठ पाउडर।       

आखिर जेनरिक दवाइयां कितनी असरदार …?


इसमें कोई शक नहीं है कि जेनरिक दवाइयाँ ब्रांडेड दवाइयों से सस्ती होती हैं। लेकिन इन्हीं कारणों से मन में ये शंका होनी लाजिमी है, कि दवाई क्वालिटी में या मरीज को आराम देने में असरकारक होगी कि नहीं। क्वालिटी के मापदंडों पर खरी भी उतरेगी ?

आज देश के बड़े शहरों में अधिकांश जगहों में जन औषधि केंद्र, भारत सरकार द्धारा एक योजना के तहत खोले गए हैं। जहां पर जेनरिक दवाइयॉं ही मिलती हैं। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों से कहीं सस्ती होने से आम लोगों में ये धारणा मन में पल गयी है कि ये दवाइयां मरीज को पूरी तरह स्वस्थ करेंगी भी कि नहीं ? देश में अभी भी कई तबके ऐसे हैं, वो ब्रांडेड दवाओं पर ज्यादा पैसे खर्च कर देते हैं, लेकिन जेनरिक दवाई लेने में परहेज करते हैं। इसके पीछे मूल कारण यही है, कि ये उनकी तुलना में कहीं सस्ती है, और लोगों में जागरूकता की कमी होना। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में जेनरिक दवाइयों की खपत ८० फीसदी तक है। इसके अलावा कई विकसित देशों में जेनरिक दवाइयां ही प्रचलन में है। 

सबसे पहले ये जानते हैं कि ब्रांडेड दवाइयां महंगी होने के पीछे क्या कारण हैं ? इसे बनाने वाली कंपनी इसकी खोज, रिसर्च, विकास, ट्रायल, क़ानूनी मंजूरी और उत्पादन आदि पर काफी पैसा खर्च करती है। कई बार तो कुछ दवाइयां ऐसी भी होती हैं, जिन पर काफी पैसा खर्च होने के बाद मार्केटिंग में परमिशन न मिलना, या किन्हीं और कारणों से मार्किट में फेल हो जाती हैं, उनका खर्चा भी इनमें जोड़ दिया जाता है। इन दवाओं के रिसर्च व प्रमोशन के लिए किसी नई दवाई का पेटेंट उस संबंधित कंपनी को २० से २५ वर्षों तक के लिए दिया जाता है। जिस कारण उस कंपनी की मार्किट में  मनोपली बनी रहती है। उक्त कंपनी इसका भी फायदा उठाती है। कई बार तो कंपनी उसकी वास्तविक लागत से कई गुना ज्यादा तक अपनी कीमत में बेचती है। इसीलिए उस कंपनी के दिए हुए ब्रांड नेम के साथ दवा अधिक कीमत पर बिकती है। इसीलिए ब्रांडेड दवाइयां महंगी होती हैं।

जेनरिक दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में सस्ती क्यों है ?

जब ब्रांडेड दवाइयों के पेटेंट की २० से २५ साल तक की समय सीमा समाप्त हो जाती है, यानी कि पेटेंट का कोई अस्तित्व नहीं रहता है, तब अन्य कंपनियों को भी इसे बनाने की परमिशन मिल जाती है। ये कंपनी उसी पेटेंट वाले फॉर्मूले की

दवाई बनानी शुरू कर देती हैं। और यही दवाई जेनरिक दवाई कहलाती हैं। या यूँ कह सकते हैं जेनरिक दवाई मूल दवाई की कॉपी होती हैं। अब चूँकि बाद में कॉपी का उत्त्पादन करने वाली कंपनियों को रिसर्च, डेवलपमेंट और उसके ट्रायल आदि

पर कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। उन्हें केवल इनके उत्पादन पर ही खर्च करना पड़ता है, जिस कारण ये दवाइयां बहुत सस्ती पड़ती हैं। इसके अलावा अनेक दवा कम्पनियों द्धारा एक ही दवा को बनाने से कम्पटीशन की वजह से भी कीमत कम हो जाती है।

अब सवाल उठता है, क्या जेनरिक दवाइयॉं भी ब्रांडेड हो सकती हैं ? हाँ। मार्किट में ब्रांडेड जेनरिक दवायें भी उपलब्ध हैं। ये जेनरिक दवाएं केमिकल फॉर्मूले के नाम से बेचीं जाती हैं, और किसी ब्रांड के नाम से भी बेचीं जाती हैं।यहां पेरासिटामोल दवा का उदाहरण देखते हैं।  पेरासिटामोल का फार्मूला एक युएसए कंपनी ने ईजाद किया था। कंपनी ने पहली बार सन १९५५ में ‘टॉयलिनाल’ (Tylenol) ब्रांड नाम से इसका पेटेंट कराया।  इसका पेटेंट खत्म होने के बाद इसे कई कम्पनियाँ बनाए और बेचने लगी।  यानी मार्किट में ‘पेरासिटामोल’ फॉर्मूले के नाम से तो मिलती ही है, और यही जेनरिक दवा ‘क्रोसिन’ और  ‘ कैलपोल ‘ब्रांड नाम से भी मार्किट में उपलब्ध है।

कई बार जेनरिक दवा की क्वालिटी हल्की होने पर भी सवाल उठाये जाते हैं। यहां ये बात जानने योग्य है, कि जेनरिक दवाओं पर कई बार रिसर्च हो चुकी है।  और इन रिसर्च में ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं में कोई अंतर नहीं मिला। पश्चिम बंगाल में कई मरीजों के ऊपर ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं के उपयोग के बाद बीमारी पर हुए लाभ के बारे में शोध हुआ था, इसमें भी सामने आया कि दोनों तरह की दवाओं में एक सा ही असर हुआ था। दवाओं की वैश्विक और नियंत्रक संस्था फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए), के अनुसार जेनरिक दवाओं को भी बेहद कठिन गुणवत्ता नियमों के मापदंडों पर खरा उतरना होता है, और जेनरिक दवा का कैमिक्ल फार्मूला मुख्य ब्रांड दवा से पूर्णतः मिलता -जुलता होना चहिये। इसीलिए जेनरिक दवाएं ब्रांड जितनी कारगर और सुरक्षित होती हैं। इसमें कोई कोई दो राय नहीं है। जेनरिक दवाएं कहाँ से खरीदें ? इन दिनों कई डॉक्टर जेनरिक दवाएं लिख रहे हैं। यदि कोई डॉक्टर आपको ब्रांडेड दवाई लिखता है, और आपको वो दवाई महँगी लगती है, तो आप डॉक्टर से पूछें कि क्या इसकी जेनरिक दवाई मार्किट में उपलब्ध है ? अगर है तो आप डॉक्टर से जेनरिक दवाई लिखने का आग्रह कर सकते हैं।  ये जेनरिक दवाई आम मेडिकल स्टोर्स में, या जनऔषधि केंद्र (भारत सरकार के मेडिक्ल स्टोर्स) में उपलब्ध होती हैं। कई बार मरीज भी डॉक्टर को जेनरिक दवाई की जगह ब्रांडेड दवाई ही लहणे कको बोलते हैं, इसके पीछे उनकी मंशा यही होती है कि ब्रांडेड दवाएं जेनरिक की बजाय अच्छी क्वालिटी की होती हैं।  जबकि ऐसा नहीं होता है।