जीवन के कष्टों का हरण करने वाले भगवान श्री गणेश …. !


गणेश चतुर्थी पर विशेष

गणेश चतुर्थी पर विशेषभगवान् शिव और पार्वती के पुत्र श्री गणेश जी जीवन आने वाली बाधाओं और बुराइयों को नष्ट करने वाले भगवान हैं। इन्हें इसीलिए विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। पूजा में इनका प्रथम स्थान माना जाता है। इसीलिए पूजा अर्चना के समय प्रथम पूजा भगवान गणेश जी की करी जाती है। ताकी पूजा अर्चना में कोई भी विघ्न बाधाएं न आएं।

पूजा का महत्व व समय :

विघ्न हर्ता प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी के जन्म दिन का उत्सव गणेश चतुर्थी। हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्री गणेश चतुर्थी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष दो सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ ही दस दिवसीय गणेशोत्सव शुरू हो जाएगा। गणेश चतुर्थी पर बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान गणेश जी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन, सौभाग्य से वर्षों बाद इस बार गणेश चतुर्थी पर कई शुभ संयोग बनेंगे। एक ओर जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग बनेगा, वहीं सिंह राशि में चतुर्ग्रही योग भी बन रहा है। यानि सिंह राशि में राशि स्वामी सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ उपस्थित रहेंगे। ग्रहों और सितारों की इस शुभ स्थिति के कारण इस त्योहार का महत्व और शुभता और बढ़ जाएगी। ग्रह-नक्षत्रों के इस शुभ संयोग में गणेश प्रतिमा की स्थापना करने से सुख-समृद्धि और शांति में बढ़ोतरी होगी।

भगवान श्री गणेश जी की मूर्ति स्थापना का मुहूर्त :

दो सितंबर दिन सोमवार की शुरुआत हस्त नक्षत्र में होगी, और श्री गणेश जी की प्रतिमाओं की स्थापना चित्रा नक्षत्र में की जाएगी। मंगल के इस नक्षत्र में चंद्रमा होने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। चित्रा नक्षत्र और चतुर्थी तिथि का संयोग 2 सितंबर को सुबह लगभग 8 बजे से शुरू होकर पूरे दिन चलेगा। इसके अतिरिक्त अभिजित मुहूर्त के संयोग पर भगवान श्री गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करना भी शुभ रहेगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार अभिजित मुहूर्त प्रातः 11.55 AM से दोपहर 12.40 PM तक रहेगा। इसके अतिरिक्त अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी शुभ लग्न या चौघड़िया मुहूर्त में गणेश जी की स्थापना कर सकते हैं।
चंद्र दर्शन निषेद :
भाद्रपद की चतुर्थी में चंद्रदर्शन से बचना चहिये। इसके दर्शन से झूठा कलंक लग जाएगा। जिस तरह भगवान श्री कृष्ण को लगा था, स्यमंतक मणि चुराने का। इसीलिए इसे कलंक चतुर्थी भी कहते हैं।

हाथी – मस्तक वाले भगवान श्री गणेश :

एक कथा के अनुसार भगवान शिव जी स्नान करने के लिए भोगवती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद माता पार्वती भी स्नान करने चली गयी। और स्नान करने से पहले माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक पुतला बनाया, और उसका नाम गणेश रख दिया। अपने इस पुत्र में जान डालकर द्वार पर पहरा देने का काम देते हुए कहा की अंदर किसी पुरुष को मत आने देना। पार्वती जी स्नान करने चली गयी। गणेश पहरा दे रहे थे। कुछ ही देर बाद भगवान शिव स्नान करके वापस लौट आये, और पार्वती के कक्ष में जाने लगे। तभी पहरे पर बैठे गणेश ने उन्हें रोक दिया, और युद्ध के लिए ललकारा। भगवान शिव ने उनसे परिचय माँगा, तो उसने स्वयं को पार्वती का पुत्र बताया। बच्चे की बात को झूठ समझने पर भगवान शिव जी क्रोधित हो गए और गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह सब देखने पर माता पार्वती को बहुत गुस्सा आया। भगवान शिव माता पार्वती के गुस्से के कारण , और अपनी गलती के कारण प्रायश्चित वश एक हाथी के सिर को गणेश के धड़ से जोड़ कर उसे नया जीवनदान दिया। इसी कारण गणेश को गजानन भी कहते हैं।

गणपति बप्पा मौर्य :

महाराष्ट्र के एक गांव खिंचवाड में एक संत मोरया गोसावी रहते थे। एक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश के आशीर्वाद से उनका जन्म हुआ था। जिसके कारण वो बचपन से गजानन के बड़े भक्त थे। एक दिन भगवान गणेश उनके सपने में आये, उन्हें कहा कि उनकी मूर्ति उन्हें नदी में मिलेगी। उसके बाद ठीक वैसे ही हुआ। नदी में स्नान के दौरान उन्हें नदी में गणेश जी की मूर्ति मिली। इस घटना के बाद लोग लोग ये मानने लगे कि यदि गणपति बप्पा का कोई भक्त है तो, तो सिर्फ मोरया गोसावी ही है। बस फिर क्या था, तभी से भक्त खिंचवाड़ गांव में मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आने लगे। मंगल मूर्ति के भक्तों को मंगल मूर्ति के मन से पुकारा जाता है। इस तरह गणपति बप्पा मोरया और मंगलमूर्ति मोरया के जयकारे की शुरुआत हुई।

भगवान के वाहन मूषक :

प्राचीन काल में गजमुख नाम का असुर रहता था। गजमुख का यह सपना था, कि पृथ्वी के अलावा स्वर्ग और पाताल पर भी उसी का अधिकार हो। अपनी इस इच्छा को पूरी करने के लिए एक दिन बघवान शिव जी तपस्या शुरू करी। भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए। उससे कोई वरदान मांगने को कहा। बस फिर क्या था, वरदान में असुर ने कहा ब्रह्मांड का कोई अस्त्र मुझे न मार सके। भगवान शिव ने वरदान स्वीकार करते हुए कहा, तथास्तु। इसके बाद असुर ने पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने स्वर्ग पर हमला कर दिया। देवताओं के अस्त्रों से उसे कोई क्षति नहीं हुई।
तभी गणेश जी उन्हें मारने के लिए अपने एक दांत को तोडा, और गजमुखासुर पर हमला किया, गजमुखासुर इससे डरकर मूषक बनकर भागने लगा।
गजमुखासुर ने भवन गणेश से क्षमा मांगी। इसके बाद भगवान गणेश ने उसको वाहन बनाकर जीवनदान दे दिया।

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