विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर विशेष …


आज पूरी दुनिया विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस ( World Nature Conservation Day ) प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को मना रही है।
भारत सरकार ने देश में 33% भूमि क्षेत्र में जंगल बनाने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में लगभग

21.5 % एरिया जंगल क्षेत्र है। इसका सीधा सा मतलब है, कि टारगेट पूरा करने के लिए २८०० करोड़ पेड़ लगाने पड़ेंगे।
जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों। मनुष्य जन्म से ही प्रकृति के सम्पर्क में आ जाता है। पृथ्वी की प्रकृति की सुरक्षा में संसाधनों के संरक्षण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रकृति के विभिन्न घटकों — जल, वायु, मिट्टी, ऊर्जा, वनस्पति, खनिज, जीव – जन्तुओं आदि के संरक्षण से पृथ्वी के प्राकृतिक सौन्दर्य में सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है।
ये जानना है जरूरी :

ये सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, कि अपनी पृथ्वी की प्रकृति सुरक्षा करे तथा उनका संरक्षण करें।
ये जानना है जरूरी :
पेड़ हमारे जीवन के लिए घातक CO 2 को कम करता है। पेड़ किसी भी जगह तापमान

एक से पांच डिग्री तक कम करता है। यानी कि सालभर में एक पेड़ २२ किलोग्राम तक कॉर्बन डाई ऑक्साइड सोख सकता है। पेड़ की जड़ें मिट्टी को बांध कर ( पकड़कर ) रखती है। जिसकी वजह से पहाड़ों पर बरसात में भूमि की कटाई होने से रूकती है। बारिश करवाने में पेड़ों का बहुत योगदान होता है। और बारिश होने से ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ता है। एक पेड़ ही हैं, जो वातावरण से कॉर्बन डाई ऑक्साइड सोखने के बाद हमारे लिए जीवनदायिनी ऑक्सीजन छोड़ता है। वातावरण को दूषित होने से बचाता है।
बरसात के दिनों में बाढ़ से बचाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की ये जिम्मेदारी है, यदि उसके घर में जगह न भी हो, लेकिन हो सके अपने आस – पास खाली जगह पर पेड़ जरूर लगाएं।

चिपको आंदोलन

कुछ सवाल जहन में गूंजते हैं :
क्या आज का मनुष्य सच में अपने आसपास के प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को समझ पाया है? क्या व्यक्ति चांद तारे, सूर्य आकाश, शीतल पवन, लहलहाते सुंदर वृक्ष, गीत गुनगुनाते पक्षी, और असीम समुद्र के विषय में सच ने समझ पाया है ?
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण से विलुप्त होते हुए जीव – जन्तुओं तथा पेड़ – पौधों का संरक्षण करना है।
पर्यावरण के समस्त जीवों का अपना भौतिक और रासायनिक अस्तित्व होता है। वे स्वयं नियन्त्रित एवं स्वचालित होते हुए भी अपने चारों ओर के पर्यावरण पर निर्भर करते हैं। जीवों के चारों ओर उपस्थित समस्त कारक जो उन्हें प्रभावित करते हैं, वही प्रकृति या वातावरण की रचना करते हैं। आज हमारा रहन – सहन, खाना – पीना सभी कुछ तो प्रकृति की ही देन है। और यदि पेड़, जंगल न होंगे तो जड़ी, बूटी, मसाले, अनाज, फल और सब्जियां आदि कहाँ से पाएंगे ? आज की दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी मानसिक तनाव को जागृत करता

है। अपने काम के साथ-साथ कुछ दिन के लिए हमें प्रकृति का भी आनंद लेना चाहिए क्योंकि प्रकृति ही वह शक्ति है जो हमें इस विश्व में सब कुछ प्रदान करती है चाहे वह हमारा खाना हो या हमारा जीवन।
प्रकृति हमारा मित्र ( Nature our best friend ) :
प्रकृति हमारा सबसे बड़ा मित्र है, क्योंकि हम इस पृथ्वी पर रहते हैं, और इसके सभी क्षेत्रों में प्रकृति का सौंदर्य देखने को मिलता है। प्रकृति से ही हमें पीने को पानी, शुद्ध-हवा, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, अच्छा भोजन और रहने को घर मिलता है जिससे मनुष्य एक बेहतर और अच्छा जीवन व्यतीत कर पाता है। पर्यावरण और प्रकृति के विनाश को रोकने के लिए हमें इसे स्वच्छ रखना होगा। प्रकृति ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया एक अद्भुत उपहार
है। प्रकृति इतनी सुंदर है कि इसमें ऐसे ही कई महत्वपूर्ण शक्ति सम्मिलित है जो हमें खुशी और स्वस्थ जीवन प्रदान करता है।प्रकृति का महत्व ( Importance of Nature ) :
हमारा प्रकृति ने हमें कई प्रकार के फूल, पक्षियां, पशु, पेड़ पौधे, नीला आकाश, ज़मीन, नदिया, समुद्र, पहाड़, प्रदान किया है।
भगवान ने इन सभी चीजों का निर्माण मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया है इसलिए हमें कभी भी इन प्राकृतिक संपदा को क्षति नहीं पहुंचाना चाहिए।
प्रकृति ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है परंतु मनुष्य हमेशा इसे बर्बाद करने में लगा हुआ है। मनुष्यों ने पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस प्रभाव, जैसे कई प्रकृति के विनाश करने वाले कारणों को अपने लाभ के लिए उत्पन्न किया। आज के टेक्नोलॉजी की दुनिया में कई नए आविष्कार किए जाते हैं परंतु इन अविष्कारों से प्रकृति पर क्या असर पड़ेगा यह
कोई नहीं सोचता। इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि वह काम करने से प्रकृति को लाभ होगा या हानि।
हमें जितना हो सके अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखना चाहिए, प्रदूषण नहीं फैलाना चाहिए, और अपने क्षेत्र में वनीकरण को बढ़ावा देना चाहिए। प्रतिदिन लाखों घर बनाए जा रहे हैं जिसके लिए लाखों-करोड़ों पेड़ों की कटाई हो रही है ऐसे में प्रतिदिन हमें नए पौधे लगाना बहुत जरूरी है ताकि प्रकृति में पेड़ पौधों का संतुलन बना रहे। सभी लोगों के साथ ही सरकार भी पेड़ों की कटाई में अपनी जिम्मेदारी समझे। जैसे, तेजी से शहरीकरण, चौड़ी, सड़कें, हाईवे बनने के कारण बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई होने से रोक लगाना। पेड़ों की कटाई से बचने के लिए चौड़े हाईवे बनाने के बजाय एलिवेटेड रोड बनाई जा सकती हैं। इससे किसानों की जमीन भी बची रहेगी, पेड़ों की कटाई भी नहीं होगी।
वन विभाग को सख्त नियम लागु करने के लिए अधिकार दिए जाएँ।
प्रकृति में मनुष्य का जितना महत्व है उतना ही जानवरों का भी इसमें महत्व है। पृथ्वी में अगर जीव-जंतु ना हो तो पृथ्वी में जीवन असंभव है। इसलिए हमारे प्रकृति को सुरक्षित रखने के लिए जीव जंतुओं की सुरक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण है।
इसी कारण विश्व के कई देशों में वन्य अभ्यारण्य बनाए गए हैं ताकि जीव जंतु सुरक्षित रह सके। साथ ही सभी देशों में जीव जंतुओं की सुरक्षा के लिए सरकारी संस्थाएं भी मौजूद है जो उस देश में रहने वाले जानवरों की देखभाल करते हैं।
कुछ मुख्य चीजों का ध्यान देकर हम प्रकृति संरक्षण कर सकते हैं जैसे –
पेड़ों की कटाई बंद करके।

हमें प्रकृति के देन का सम्मान करना चाहिए और प्रकृति का उपयोग नियम अनुसार करना चाहिए।
चिपको आंदोलन जैसा एक मिशन और होना चहिये :
आज से करीब 45 साल पहले चमोली जिले में गोपेश्वर, उत्तराखंड में एक आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसे नाम दिया गया था चिपको आंदोलन। इस आंदोलन की चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी की ओर से की गई थी और भारत के प्रसिद्ध सुंदरलाल बहुगुणा ने आगे इसका नेतृत्व किया। इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचाने के लिए गांव के पुरुष, महिलाएं लोग पेड़ से चिपक जाते थे, इसी वजह से इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन पड़ा था। चिपको आंदोलन 1972 में शुरु हुई जंगलों की अंधाधुंध और अवैध कटाई को रोकने के लिए शुरू किया गया, इस आंदोलन में महिलाओं का भी खास योगदान रहा और इस दौरान कई नारे भी मशहूर हुए और आंदोलन का हिस्सा बने। उस समय केंद्र सरकार ने इस आन्दोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया। हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 सालों का प्रतिबंध लगा दिया था
बाद में चिपको आंदोलन ना सिर्फ उत्तराखंड बल्कि पूरे देश में फैल गया था और इसका असर दिखने लगा था।
सरकार बच्चों को प्राइमरी स्कूल से ही बच्चों को इसके लिए जागरूक करें।
ताकि पृथ्वी हर एक मनुष्य को पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़े बिना इस सुंदर प्रकृति का आनंद उठा सके।

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