श्रावण मास


श्रावण मास चल रहा है। शिवजी का महीना है। लगभग कई भक्तगण अपने नजदीकी मंदिर में शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक दूध, जल, बेल पत्र आदि चढ़ाने जाते हैं। ये हमारी परम्परा है, हमारी संस्कृति है। मैं भी मानता हूँ। मुझे एक सज्जन शिव मंदिर में मिलते थे, वह

सज्जन शिव मंदिर में सुबह – सुबह लगभग साढ़े चार बजे मंदिर में शिवलिंग पर दूध, जल, बेल पत्र और सफेद चंदन का तिलक लगाया करते थे। मैं उनकी श्रद्धा के आगे नतमस्तक हो गया। फिर श्रावण मास की शिव रात्रि पर वो सज्जन पूरा चालीस लीटर का दूध का केन लेकर शिवलिंग पर चढ़ाते थे। हम मंदिर की परिक्रमा करते हुए पीछे बगीचे में देखा करते थे, शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध, जल आदि नालियों के जरिये आगे बड़े नाले में गिरता था। हम अपनी परिक्रमा करने के बाद वापस अपने घर जाने को निकलते थे, मंदिर के बाहर रोड पर भूख से बिलखते छोटे – छोटे बच्चों को गोद में लेकर माएं हाथ पसार कर भीख मांगते हुए मिलते थे। और दूसरी तरफ जिस दूध को शिवलिंग पर इस तरह बड़ी मात्रा में शिवलिंग के जरिये नालियों व नालों में बहाया जा रहा है। क्या हम दूध की थोड़ी मात्रा जल में मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की कोशिश करें …? कई मंदिरों में आमतौर पर शिवलिंग के ठीक ऊपर एक क्लश टंगा होता है, जिसके द्वारा शिवलिंग के ठीक ऊपर जलधारा बूंद – बूंद डलती रहती है। उसमें भी कुछ दूध, जल डाल सकते हैं। और बाकी बचे दूध को गरीब बच्चों के लिए भण्डारा, लंगर लगा दें। इससे दूध नालियों में भी नहीं जायेगा। गरीब बच्चों की दुआएं और पुण्य अलग मिलेगा। क्षमा करना, मेरा मकसद किसी की भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। कुछ शुरुआत करें, दूसरों को भी प्रेरित करें। शिवजी की कृपा आप पर बनी रहेगी।

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