पश्चाताप


मैंने कल अपने एक मित्र को क्रोधवश अनाप-शनाप बोल दिया था, और घर आकर ओंधे

मुंह लेट सारी रात पश्चाताप की पीड़ा भोगी। अलसुबह भी मन काफी खिन्न था। तभी आवाज गूंजी…..कचरे वाला, कचरे वाला… अपने घर का कचरा दे दो …। वह स्वीपर कचरा लेने आया था। मैंने बरबस एक कागज के टुकड़े पर लिखा … ‘ क्रोध ‘, और उसे कचरा गाड़ी में डाल दिया।
गाड़ी वाला बोला, ये क्या मजाक है ….साहब ? क्या आज कचरा नहीं है ?
ये कचरा ही तो है …
गाड़ी वाले के चेहरे पर आश्चर्य और विस्मय के भाव थे। वह कुछ पल के लिए ठिठका और वहां से आगे बढ़ गया।

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