मोबाइल टावरों का दंश….


पहले के समय अक्सर आम घरों में आम, अमरुद, आड़ू या जामुन आदि के पेड़ लोग अपने घरों में लगाया करते थे। उनके ऊपर पक्षी अपने घोंसले बनाकर रहते थे। सुबह नींद भी पक्षियों की चहचआहट से खुलती थी। वातावरण में साफ

ऑक्सीजनयुक्त हवा थी, किसी तरह की कोई ऐसी जानलेवा चीज हवा में नहीं थी, जिससे कि किसी पक्षी या जीव को कोई नुकसान पहुंचा सके। दूर रिश्तेदारों से बात करने के लिए या तो खत होते थे, या घरों में लैंडलाइन फ़ोन होते थे।
लेकिन इन सबके बाद साइंस ने एक तरह से मोबाइल के क्षेत्र में क्रांति लाकर खड़ी कर दी। जैसा कि मानव स्वभाव के अनुसार हर पल अपने लिए सुख सुविधाएँ जुटानी शुरू कर दी। आज हालत ये हो गयी है चाहे बिज़नेसमैन, नौकरीपेशा,


हाउसवाइफ, स्टूडेंट या मजदूरवर्ग आदि सभी के लिए मोबाइल एक पर्याय बन गया हे। इसके अलावा जब से व्हाट्सप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसी कई और ऍप्लिकेशन्स आ गई हैं। या यूँ कहें मोबाइल उनके लिए एक जरूरत के अलावा, लत के सामान, यानी मोबाइल के बिना रह ही नहीं सकते। मोबाइल की बिक्री का आंकड़ा कुछ यूँ समझते हैं —
भारत में मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं ने २०१४ में ५८१ मिलियन उपयोगकर्ताओं को पार किया और पिछले एक दशक में लगातार वृद्धि हुई है।

२०१५ में eMarketer के एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में २०१९ में ८०० मिलियन से अधिक मोबाइल फोन उपयोगकर्ता होने का अनुमान है।
जैसे-जैसे मोबाइल कम्पनियाँ इस क्षेत्र में आने लगी, उसी तरह अपने कस्टमरों

को सिग्नल्स देने के लिए नित नए शहरों, कस्बों यहां तक कि गाँव में भी मोबाइल टावरों की एक तरह से बाढ़ सी आ गयी। पिछले लगभग दो दशक से जब से मोबाइल आये हैं। तो पेड़ों की जगह मोबाइल टावरों ने ले ली है। घर की छत या किसी कमर्शियल बिल्डिंग की छत सब जगह टावरों से पटी पड़ी है। इसके लिए मोबाइल कंपनियां अच्छी रकम भी देती हैं। जैसे – जैसे मोबाइल कंपनियों के कस्टमर बढ़ रहे हैं, वैसे ही टावरों पर मोबाइल के लिए सिग्नल्स पहुंचाने के लिए एक्स्ट्रा एंटिना लग रहे हैं। मोटी रकम की लालच में अब तो
किसान भी अपनी जमीन में टावर बनाने के लिए कुछ जगह दे देते हैं। आज जहां भी नजर दौड़ाते हैं मोबाइल टावर ही नजर आते हैं। पिछले दिनों मोबाइल टावरों को लेकर कई शोध हुए हैं जिनके अनुसार :
मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन बेशक देश-दुनिया में बहस और शोध का विषय बने हुए हैं, लेकिन उनसे होने वाले नुकसान की आशंका से कोई इनकार

नहीं कर सकता। देश में ही कई विश्वविद्यालय और आईआईटी मोबाइल और उसके टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन से मानव जीवन और पक्षियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर शोध कर चुके हैं। इनमें से अधिकतर इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मोबाइल टॉवर से होने वाला रेडिएशन इंसानों के लिए ही नहीं जीव जंतुओं के लिए

भी काफी हानिकारक है। लेकिन हैरतअंगेज रूप से देश के नीति नियंता इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं, देश के दूरसंचार मंत्री तो इस बात से ही इंकार करते हैं कि मोबाइल टॉवरों से इंसानी जीवन आदि को किसी प्रकार का कोई खतरा है।
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दावा किया कि अभी तक हुए शोधों के अनुसार मोबाइल टावरों से इंसानी जीवन को किसी भी प्रकार के खतरे के संकेत नहीं मिले हैं। इसके लिए वह डब्लूएचओ के शोध का हवाला भी देते हैं।
लेकिन इससे इतर कई महत्वपूर्ण शोधों में पुख्ता तरीके से इस बात को पेश किया गया, कि किस तरह मोबाइल और उसके टावरों से निकलने वाले रेडिएशन मानव जाति और दूसरे जीवों के लिए खतरनाक होते जा रहे है, इसके चलते लोगों को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का सामना भी करना पड़ रहा है।
मोबाइल टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन पर आईआईटी दिल्ली के प्रोफेशर गिरीश कुमार ने काफी पहले एक शोध
किया था। उनके अनुसार मोबाइल से ज्यादा परेशानी उसके टावरों से है। क्योंकि मोबाइल का इस्तेमाल हम लगातार नहीं करते, लेकिन टावर लगातार चौबीसों

घंटे रेडिएशन फैलाते हैं। मोबाइल पर अगर हम घंटा भर बात करते हैं, तो उससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए हमें २३ घंटे मिल जाते हैं, जबकि टावर के पास रहनेवाले उससे लगातार निकलने वाली तरंगों की जद में रहते हैं। वो दावा करते हैं कि अगर घर के सामने टावर लगा है तो उसमें रहनेवाले लोगों को २-३ साल के अंदर सेहत से जुड़ी समस्याएं शुरू हो सकती हैं। वो बताते हैं कि मोबाइल टावर के ३०० मीटर एरिया में सबसे ज्यादा रेडिएशन होता है। एंटिना के सामने वाले हिस्से में सबसे ज्यादा तरंगें निकलती हैं। जाहिर है, सामने की ओर ही नुकसान भी ज्यादा होता है, पीछे और नीचे के मुकाबले। इसी तरह दूरी
भी बहुत अहम है। टावर के एक मीटर के एरिया में १०० गुना ज्यादा रेडिएशन होता है। टावर पर जितने ज्यादा ऐंटेना लगेहोंगे, रेडिएशन भी उतना ज्यादा होगा।
टावरों की रेडिएशन से पक्षियों पर भी पड़ रहा प्रभाव :
ये सर्व विदित है, कि पक्षी प्रकृति का बहुत संवेदनशील जीव है। पक्षी, जिनमे हमें

हर समय घरों में या घर के आसपास दिखाई देने वाली गौरया ढूंढे नहीं मिलती। इसी तरह कौवों, गुलशर और अन्य पक्षियों की संख्या भी तेजी से घटी है।
वैज्ञानिक इसका कारण भी मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली रेडिएशन को मानते हैं। घंटे रेडिएशन फैलाते हैं। मोबाइल पर अगर हम घंटा भर बात करते हैं, तो उससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए हमें २३ घंटे मिल जाते हैं, जबकि टावर के पास रहनेवाले उससे लगातार निकलने वाली तरंगों की जद में रहते हैं। वो दावा करते हैं कि अगर घर के सामने टावर लगा है तो उसमें रहनेवाले लोगों को २-३ साल के अंदर सेहत से जुड़ी समस्याएं शुरू हो सकती हैं। वो बताते हैं कि मोबाइल टावर के ३०० मीटर एरिया में सबसे ज्यादा रेडिएशन होता है। एंटिना के सामने वाले हिस्से में सबसे ज्यादा तरंगें निकलती हैं। जाहिर है, सामने की ओर ही नुकसान भी ज्यादा होता है, पीछे और नीचे के मुकाबले। इसी तरह दूरी
भी बहुत अहम है। टावर के एक मीटर के एरिया में १०० गुना ज्यादा रेडिएशन होता है। टावर पर जितने ज्यादा ऐंटेना लगेहोंगे, रेडिएशन भी उतना ज्यादा होगा।
टावरों की रेडिएशन से पक्षियों पर भी पड़ रहा प्रभाव :
ये सर्व विदित है, कि पक्षी प्रकृति का बहुत संवेदनशील जीव है। पक्षी, जिनमे हमें हर समय घरों में या घर के आसपास दिखाई देने वाली गौरया ढूंढे नहीं मिलती। इसी तरह कौवों, गुलशर और अन्य पक्षियों की संख्या भी तेजी से घटी है।
वैज्ञानिक इसका कारण भी मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली रेडिएशन को मानते हैं।

केरल में हुई जांच के अनुसार मोबाइल टावरों के पास जिन गौरेयों ने अंडे दिए, ३० दिन के बाद भी उनमें से बच्चे नहीं निकले, जबकि आमतौर पर इस काम
में १०-१५ दिन लगते हैं। गौरतलब है कि टावर्स से काफी हल्की फ्रीक्वेंसी (९०० से १८०० मेगाहर्ट्ज) की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्ज निकलती हैं, लेकिन ये भी छोटे चूजों को काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
जर्मनी में हुए एक रिसर्च के मुताबिक जो लोग ट्रांसमिटर ऐंटेना के ४०० मीटर एरिया में रहते थे उनमें कैंसर होने की आशंका तीन गुना तक बढ़ गई। ४०० मीटर के एरिया में ट्रांसमिशन बाकी एरिया से १०० गुना ज्यादा होता है।
वहीं केरल में हुई रिसर्च के अनुसार मोबाइल टॉवरों से होने वाले रेडिएशन से मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता ६० फीसदी तक गिर गई।

कुछ समय पहले राजस्थान के जयपुर में रेडिएशन पर आयोजित सेमिनार में भाग लेने आई नोबल पुरस्कार विजेता
डा. डेवेरा डेविस ने जोर देकर कहा था, कि रेडियेशन के कारण ब्रेन कैंसर, याददाशत में कमी, बहरापन और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। डा. डेविस ने मोबाइल फोन और टावर से निकलने वाले रेडियेशन के खतरों पर लंबे समय तक शोध किया है, उनकी इन्हीं शोध के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शोध के आधार पर ही उन्होंने दावा किया मोबाइल फोन को सीने से चिपकाकर रखने वाली महिलाओं में ब्रेंस्ट कैंसर तथा पेंट की जेब में मोबाइल रखने वालों में नपुंसकता (इम्पोटैंसी), शुक्राणुओं में कमी और कैंसर जैसे रोग पनप रहे हैं। उन्होंने बताया कि मोबाइल टावर के निकट रहने वाले लोगों में कैंसर का खतरा अन्य के मुकाबले अधिक होता है।
यह गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए तो ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने शोध के बारे में बताया था, कि रेडिएशन से चूहों के प्रजनन तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ा, इसके कारण पशु-पक्षी तक मोबाइल टावर के पास नहीं जाते।
मुख्यतः रेडिएशन से होने वाले नुकसान — थकान, अनिद्रा, डिप्रेशन, ध्यान भंग, चक्कर आना, याद्दाश्त कमजोर होना, सिरदर्द, दिल की धड़कन बढ़ता, पाचन क्रिया पर असर, कैंसर का खतरा बढ़ जाना और ब्रेन ट्यूमर।
अतः सचेत रहना होगा, यदि कोई चीज हमारे लिए फायदेमंद है, तो जरूरी नहीं कि वह हमें नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
सरकार को जनहित में मोबाइल टावरों की स्थापना के लिए कारगर नीति अपनानी होगी.

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