प्रारम्भिक ज्योतिष ज्ञान


प्रणाम भाइयों व बहनों

पिछली बार मैंने प्रारम्भिक ज्योतिष से संबंधित पंचांग में तिथि और वार के बारे में विस्तार से बताया था। आज उन्हीं तिथियों के स्वामीं के  नाम के बारे में चर्चा करते हैं ….

हर तिथि का अपना स्वामी होता है। जैसे कि —

प्रथम तिथि यानी कि प्रतिपदा का स्वामी — ‘अग्नि ‘, दिव्तीय तिथि का स्वामी — ‘ ब्रह्मा ‘, तृतीय का स्वामी — गौरी, चतुर्थी के ‘ गणेश ‘, पंचमी के ‘ शेषनाग ‘, षष्टी के ‘ कार्तिकेय ‘, सप्तमी के ‘ सूर्य ‘, अष्टमी  के ‘ शिव ‘, नवमी की ‘ दुर्गा ‘,

दशमी के ‘ काल ‘ , एकादशी के ‘ विश्वदेवा ‘, द्वादशी के ‘ विष्णु ‘ , त्रयोदशी के ‘ कामदेव ‘,चतुर्दशी के ‘ शिव ‘ और पूर्णिमा यानी पूर्णमासी के ‘ चन्द्रमा ‘। और इसी तरह अमावस्या के ‘ पित्तर ‘ हैं।

इस तरह तिथियों के स्वामियों के स्वभाव के अनुसार तिथियों का स्वभाव भी   होता है। इनका शुभाशुभ इनके स्वभावानुसार होता है।

तिथियों के प्रकार निम्नलिखित होते हैं।

१. नन्दा तिथि, २. भद्रा तिथि, ३. जय तिथि, ४. रिक्ता तिथि, ५. पूर्ण तिथि, ६. पक्षरन्ध्र तिथि।

१. नन्दा तिथि –१,६,११ नन्दा तिथि कहलाती है। घर में उत्सव, कृषि संबंधित कार्य, गीत, संगीत, वस्त्र निर्माण और वस्त्रों की खरीदारी इसमें शुभ होती है।

२. भद्रा तिथि — २,७,१२ भद्रा तिथि कहलाती है। वाहन, गाड़ियों की खरीदारी, गृह निर्माण आरम्भ करना, विवाह – उत्सव, यात्रा, आभूषणों की खरीदारी व धारण करना शुभ होता है।

३. जय तिथि — ३,८,१३ तिथियां जया तिथि कहलाती है। इसमें उत्सव, गृह निर्माण व आरंभ करना, गृह – प्रवेश, नवीन ब्यापार, सेना का युद्धाभ्यास, शस्त्र प्रशिक्षण,शस्त्र खरीदारी व निर्माण और सेना संबंधित अन्य कार्य इसमें शुभ होते हैं।

४. रिक्ता तिथि — ४,९,१४ रिक्ता तिथियां हैं। इसमें क्रूर कार्य जैसे कि शत्रु की हत्या,शस्त्रों का प्रयोग, शल्य क्रिया और अग्नि – देना जैसे ईंट, भटटों आदि में।

५. पूर्ण तिथि — ५,१०,१५ पूर्ण तिथियां हैं। इसमें यज्ञ करना, विवाह- उत्सव, शांति पाठ, पूजा, हवन व् स्वास्थ्य रक्षक तिथि है।

 ६. पक्षरन्घ्र तिथि — ४,६,८,९,१२ व १४ पक्षरन्घ्र तिथियां हैं। शुक्ल पक्ष में प्रथम पांच तिथियों तक चन्द्रमाँ क्षीण होता है।

अतः इसे अशुभ माना जाता है। आगामी पांच तिथियों को मध्यम फलदायी और अंतिम पांच तिथियों को विशेष लाभकारी माना गया है। इसी तरह कृष्ण पक्ष की पांच तिथियों तक चन्द्रमा पक्षबली होता है। अतः इसे विशेष लाभकारी व शुभ माना  गया है। इसी तरह आगामी पांच तिथियां मध्यम शुभ व अंतिम पांच तिथियां अशुभ हैं।

रिक्ता तिथियां जैसा कि नाम से ज्ञात है, रिक्ता यानी कि रिक्त, खाली। अतः प्रायः ये अशुभ हैं।

क्षय तिथियां — जो तिथि सूर्य उदय के उपरांत शुरू हो और अगले दिन सूर्य उदय से पहले समाप्त हो जाये, उसे क्षय तिथि कहते हैं। यह तिथि शुभ कार्यों के लिए वर्जित है।  इसीलिए क्षय तिथि में शुभ महूर्त नहीं निकाला जाता है।

वृद्धि तिथि — जो तिथि सूर्य उदय से पहले शुरू होकर अगले दिन सूर्य उदय के बाद समाप्त हो, उसे वृद्धि तिथि कहते हैं। इस तिथि में भी शुभ महूर्त नहीं होता है।

पढ़वा तिथि — यदि कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्थी, अमावस्या और पूर्णिमा तिथियां सक्रांति के दिन आये तो उन्हें पढ़वा तिथि कहते हैं। इसमें भी शुभ महूर्त नहीं होता है।

गलगरहा तिथि — कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, दोनों पक्षों की सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या और प्रथम तिथियों को गलगरहा तिथियां माना गया है। इन तिथियों में विद्या आदि के लिए शुभ महूर्त नहीं निकले जाते।

आज के समय में चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण के बारे में लगभग सभी जानते ही हैं, लेकिन यहां पर यह ज्योतिष का विषय होने की वजह से बता रहे हैं। 

चन्द्र ग्रहण — यह पूर्णिमा के दिन होता है। उस दिन चंदमा और सूर्य के बीच में पृथ्वी एक सीध में आ जाती है, तो पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ने लगती है।  इस तरह चन्द्रमा पर ग्रहण की स्थति पैदा हो जाती है। इसी को चन्द्र ग्रहण कहते हैं।

सूर्य ग्रहण — जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा एक सीध ,में आ जाता है, तो सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के ऊपर नहीं पड़ता है। इसी को सूर्य ग्रहण कहते हैं। यह अमावस्या के दिन होता है।  

शेष आगे …

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