भयावह जलसंकट का समाधान सम्भव हो सकता है, बशर्ते …


ये एक भयावह सत्य है, भारत में दुनिया की १८ फीसदी आबादी निवास करती है, लेकिन यहां पीने योग्य पानी केवल ४ फीसदी है। देश के २१ शहरों में भूजल स्तर अगले दो सालों में खत्म हो जायेगा। और साल २०४० तक भारत का अधिकांश भूजल समाप्त हो जायेगा। जरा ठहरिये, एक और तथ्य देख लेते हैं। भारतीय

मानक ब्यूरो के अनुसार बड़े शहरों में जहां पूर्ण फ्लश शौचालय स्थापित हो गए हैं, वहां प्रीतिदिन प्रति ब्यक्ति २०० लीटर पानी की जरूरत है। यानी कि प्रति परिवार प्रतिवर्ष करीब ३,६०,००० लीटर पानी। कस्बों अर्द्धशहरी क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में यह मात्रा १३५ लीटर निर्धारित की गई है, अर्थात प्रति परिवार
प्रतिवर्ष २,३०,००० लीटर पानी। हमारे यहां करीब २५ करोड़ परिवार हैं। अब दोनों तथ्यों को जोड़ कर देखिये , जलसंकट की भयावह स्थति नजर आएगी।
गौर करने वाली बात है, क्या हमारे यहां जलसंकट वाकई इतना इतना बड़ा है कि हम कुछ नहीं कर सकते ? दरअसल समस्या पानी के संकट से ज्यादा उसके प्रबंधन को लेकर है। इतनी विषमताओं और विरोधाभासी परिस्थितियों के बावजूद अब भी भारत में इतना पानी तो है, कि इसे संभाला जा सकता है।

लेकिन इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास करने होंगे, जिनमें ब्यक्तिगत से लेकर सरकारी स्तर तक के प्रयास शामिल हैं। सबसे पहले ब्यक्तिगत प्रयासों में भी ये शामिल है कि क्या हम अपने फ्लश टैंकों की कैपेसिटी को कम करके क्या कुछ पानी बचा सकते हैं, या अपनी – अपनी सोसाइटियों में वाहनों की धुलाई और स्विमिंग पुलों में होने वाली पानी की बर्बादी को कितना रोक सकते हैं ? लेकिन प्रयास इससे एक कदम आगे बढ़कर भी करना होगा। सबसे बढ़कर हमें अपनी खानपान की आदतों पर भी ध्यान देना होगा।
वैज्ञानिक रूप से पुष्ट इन तथ्यों पर गौर करें :
आज जिस तरह से भूमिजल का जिस तरह दोहन हो रहा है, चाहे वो भवन निर्माण हो, या फसलों की खेती के लिए।
एक किलो चावल की पैदावार के लिए करीब २००० लीटर, एक किलो गेहूं के लिए करीब ११०० लीटर और एक किलो मक्का के लिए करीब ६५० लीटर पानी की

जरूरत होती है। वहीं एक किलो आलू को पैदा करने के लिए करीब २५० लीटर पानी की खपत होती है। जबकि एक किलो मांस के लिए करीब १८००० लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। तो इसका सीधा सा अर्थ है, कि हम सभी अपनी खानपान की आदतों में थोड़ा – थोड़ा बदलाव ले आएं, तो कितना पानी बचा सकते हैं।
ऐसे फल जिनका ऊपरी छिलका कठोर होता है, वे अपनी जड़ों में १०,००० लीटर तक पानी तक सहेजते हैं। तो क्या हम हर साल किसी खाली जमीन पर बेल या कबीट का पेड़ लगा सकते है ? हाँ अगर पानी को बचाना है तो यह करना ही होगा। इसके अतिरिक्त पेड़ों की जड़ें भूमि के अनाश्यक कटाव को रोकती है। वैसे चावल और मांसाहार को कम करना, और ज्यादा से ज्यादा मोटे अनाज को अपनी डाइट में शामिल करना और भी ज्यादा आसान होगा। तो आइये शुरुआत
इसी से करते हैं।
स्वीडन में ड्रेनेज सिस्टम अलविदा :
हमारे यहां ड्रेनेज सिस्टम की कमी पर काफी चिंता जताई जा रही है, और इन्हीं चिंताओं के मद्देनजर अब कई शहरों में स्थानीय निकाय इन पर काम कर रहे हैं। जबकि जरूरत तो ये है कि जो ड्रेनेज सिस्टम पहले से है, उसको भी समाप्त कर दिया जाये। जैसाकि विकसित देश स्वीडन ने अपने यहां किया है। स्वीडन ने ड्रेनेज सिस्टम को खत्म कर हर घर को एमबीआर ( मेम्बरेन बाय रिएक्टर ) से जोड़ा जा रहा है। बड़ी – बड़ी आवासीय सोसाइटियों और ब्यवसायिक क्षेत्रों को भी एमबीआर से कनेक्ट किया जा रहा है। इसके तहत तीन विशालकाय सेफ्टिक टैंक निर्मित किये जाते हैं।
एक के भर जाने के बाद दूसरा, फिर तीसरा शुरू कर दिया जाता है। समय के साथ पहले जमा ठोस अवशिष्ट उपजाऊ मिटटी में बदल जाता है। जिसका इस्तेमाल खेती में किया जा सकता है। इससे न केवल ढेर सारा पानी बचाया जा सकता है, बल्कि भारत जैसे देश में जहां की मिटटी रसायनों के ज्यादा इस्तेमाल से उर्वरा शक्ति खोती जा रही है, में ये प्रणाली तो वरदान साबित होगी।
ऐसे में जरूरत है इच्छा शक्ति की। कुछ भी हो सकता है।

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