आखिर जेनरिक दवाइयां कितनी असरदार …?


इसमें कोई शक नहीं है कि जेनरिक दवाइयाँ ब्रांडेड दवाइयों से सस्ती होती हैं। लेकिन इन्हीं कारणों से मन में ये शंका होनी लाजिमी है, कि दवाई क्वालिटी में या मरीज को आराम देने में असरकारक होगी कि नहीं। क्वालिटी के मापदंडों पर खरी भी उतरेगी ?

आज देश के बड़े शहरों में अधिकांश जगहों में जन औषधि केंद्र, भारत सरकार द्धारा एक योजना के तहत खोले गए हैं। जहां पर जेनरिक दवाइयॉं ही मिलती हैं। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों से कहीं सस्ती होने से आम लोगों में ये धारणा मन में पल गयी है कि ये दवाइयां मरीज को पूरी तरह स्वस्थ करेंगी भी कि नहीं ? देश में अभी भी कई तबके ऐसे हैं, वो ब्रांडेड दवाओं पर ज्यादा पैसे खर्च कर देते हैं, लेकिन जेनरिक दवाई लेने में परहेज करते हैं। इसके पीछे मूल कारण यही है, कि ये उनकी तुलना में कहीं सस्ती है, और लोगों में जागरूकता की कमी होना। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में जेनरिक दवाइयों की खपत ८० फीसदी तक है। इसके अलावा कई विकसित देशों में जेनरिक दवाइयां ही प्रचलन में है। 

सबसे पहले ये जानते हैं कि ब्रांडेड दवाइयां महंगी होने के पीछे क्या कारण हैं ? इसे बनाने वाली कंपनी इसकी खोज, रिसर्च, विकास, ट्रायल, क़ानूनी मंजूरी और उत्पादन आदि पर काफी पैसा खर्च करती है। कई बार तो कुछ दवाइयां ऐसी भी होती हैं, जिन पर काफी पैसा खर्च होने के बाद मार्केटिंग में परमिशन न मिलना, या किन्हीं और कारणों से मार्किट में फेल हो जाती हैं, उनका खर्चा भी इनमें जोड़ दिया जाता है। इन दवाओं के रिसर्च व प्रमोशन के लिए किसी नई दवाई का पेटेंट उस संबंधित कंपनी को २० से २५ वर्षों तक के लिए दिया जाता है। जिस कारण उस कंपनी की मार्किट में  मनोपली बनी रहती है। उक्त कंपनी इसका भी फायदा उठाती है। कई बार तो कंपनी उसकी वास्तविक लागत से कई गुना ज्यादा तक अपनी कीमत में बेचती है। इसीलिए उस कंपनी के दिए हुए ब्रांड नेम के साथ दवा अधिक कीमत पर बिकती है। इसीलिए ब्रांडेड दवाइयां महंगी होती हैं।

जेनरिक दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में सस्ती क्यों है ?

जब ब्रांडेड दवाइयों के पेटेंट की २० से २५ साल तक की समय सीमा समाप्त हो जाती है, यानी कि पेटेंट का कोई अस्तित्व नहीं रहता है, तब अन्य कंपनियों को भी इसे बनाने की परमिशन मिल जाती है। ये कंपनी उसी पेटेंट वाले फॉर्मूले की

दवाई बनानी शुरू कर देती हैं। और यही दवाई जेनरिक दवाई कहलाती हैं। या यूँ कह सकते हैं जेनरिक दवाई मूल दवाई की कॉपी होती हैं। अब चूँकि बाद में कॉपी का उत्त्पादन करने वाली कंपनियों को रिसर्च, डेवलपमेंट और उसके ट्रायल आदि

पर कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। उन्हें केवल इनके उत्पादन पर ही खर्च करना पड़ता है, जिस कारण ये दवाइयां बहुत सस्ती पड़ती हैं। इसके अलावा अनेक दवा कम्पनियों द्धारा एक ही दवा को बनाने से कम्पटीशन की वजह से भी कीमत कम हो जाती है।

अब सवाल उठता है, क्या जेनरिक दवाइयॉं भी ब्रांडेड हो सकती हैं ? हाँ। मार्किट में ब्रांडेड जेनरिक दवायें भी उपलब्ध हैं। ये जेनरिक दवाएं केमिकल फॉर्मूले के नाम से बेचीं जाती हैं, और किसी ब्रांड के नाम से भी बेचीं जाती हैं।यहां पेरासिटामोल दवा का उदाहरण देखते हैं।  पेरासिटामोल का फार्मूला एक युएसए कंपनी ने ईजाद किया था। कंपनी ने पहली बार सन १९५५ में ‘टॉयलिनाल’ (Tylenol) ब्रांड नाम से इसका पेटेंट कराया।  इसका पेटेंट खत्म होने के बाद इसे कई कम्पनियाँ बनाए और बेचने लगी।  यानी मार्किट में ‘पेरासिटामोल’ फॉर्मूले के नाम से तो मिलती ही है, और यही जेनरिक दवा ‘क्रोसिन’ और  ‘ कैलपोल ‘ब्रांड नाम से भी मार्किट में उपलब्ध है।

कई बार जेनरिक दवा की क्वालिटी हल्की होने पर भी सवाल उठाये जाते हैं। यहां ये बात जानने योग्य है, कि जेनरिक दवाओं पर कई बार रिसर्च हो चुकी है।  और इन रिसर्च में ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं में कोई अंतर नहीं मिला। पश्चिम बंगाल में कई मरीजों के ऊपर ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं के उपयोग के बाद बीमारी पर हुए लाभ के बारे में शोध हुआ था, इसमें भी सामने आया कि दोनों तरह की दवाओं में एक सा ही असर हुआ था। दवाओं की वैश्विक और नियंत्रक संस्था फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए), के अनुसार जेनरिक दवाओं को भी बेहद कठिन गुणवत्ता नियमों के मापदंडों पर खरा उतरना होता है, और जेनरिक दवा का कैमिक्ल फार्मूला मुख्य ब्रांड दवा से पूर्णतः मिलता -जुलता होना चहिये। इसीलिए जेनरिक दवाएं ब्रांड जितनी कारगर और सुरक्षित होती हैं। इसमें कोई कोई दो राय नहीं है। जेनरिक दवाएं कहाँ से खरीदें ? इन दिनों कई डॉक्टर जेनरिक दवाएं लिख रहे हैं। यदि कोई डॉक्टर आपको ब्रांडेड दवाई लिखता है, और आपको वो दवाई महँगी लगती है, तो आप डॉक्टर से पूछें कि क्या इसकी जेनरिक दवाई मार्किट में उपलब्ध है ? अगर है तो आप डॉक्टर से जेनरिक दवाई लिखने का आग्रह कर सकते हैं।  ये जेनरिक दवाई आम मेडिकल स्टोर्स में, या जनऔषधि केंद्र (भारत सरकार के मेडिक्ल स्टोर्स) में उपलब्ध होती हैं। कई बार मरीज भी डॉक्टर को जेनरिक दवाई की जगह ब्रांडेड दवाई ही लहणे कको बोलते हैं, इसके पीछे उनकी मंशा यही होती है कि ब्रांडेड दवाएं जेनरिक की बजाय अच्छी क्वालिटी की होती हैं।  जबकि ऐसा नहीं होता है। 

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