करिश्माई भाजपा


पूरे तीन दशक के बाद राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है। और ये सब हो सका है, अमित शाह और नरेंद्र मोदी की वजह से। आज भाजपा पुनः एक नए रूप में अपने को निखारती हुई प्रकट हुई है। देश के इतिहास में गैर कांग्रेसी

पार्टी के रूप में दोबारा अपने दम पर पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने वाली भाजपा पहली और अकेली पार्टी बन गई है। देश में राजनीति के दृश्य पटल पर
आज दूर तक कोई राष्ट्रीय स्तर की पार्टी नजर नहीं आती।
करिश्माई भाजपा का रूप …
भाजपा यानी की फीनिक्स। यहां अपनी ही राख में पैदा होने वाले फीनिक्स को हम अपनी भाषा में ककनूस भी कह सकते हैं। दो सीटों से ३०० सीटों के पार जाने का यह सफर बहुत संघर्षपूर्ण भी रहा, और मिसाल भी। अटल जी से शुरू हुई कहानी नरेंद्र मोदी पर जाकर इतनी बड़ी हो जाएगी, शायद इसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा। दरअसल ककनूस एक कल्पित पक्षी है, और जब यह अपनी उम्र पूरी करने को होता है तो सुगंधित टहनी चुनता है, और उनके ढेर पर बैठकर सुंदर स्वर लहरियां छेड़ता है। उसकी चोंच से चिंगारियां निकलती हैं, और लकड़ियों के जिस ढेर पर वह बैठा होता है, वह आग पकड़ लेती है। वह पक्षी वहीं जलकर भस्म हो जाता है। पावस की पहली बूंद जब उस राख पर पड़ती है तो नया ककनूस पैदा होता है। भाजपा भी इसी ककनूसी नस्ल की है। ककनूस के इस इतिहास का यहां इतना सा मतलब है, कि भाजपा को इससे जोड़ना काफी सहज और मोजू लगता है। इस बार के चुनाव में जो भाजपा ने किया है, यह असम्भव कार्य को करने जैसा है। ऐसे लगता है पीपल के पत्तों पर जैसे देवता बैठे होते हैं। हिलाओ और पा लो। वैसे ही जैसे नरेंद्र मोदी ने पेड़ को हिलाया और हर प्रदेश से भाजपा की झोली में सांसद आ गिरे हों।

अब ३० मई को शपथ ग्रहण समारोह है, और उसी दिन या अगले दिन मंत्रियों के विभागों के नाम भी घोषित हो जायेंगे, क्योंकि इतनी प्रचंड जीत के बाद कोई इस बात पर अड़ने वाला तो है नहीं कि मुझे भी मंत्री बनाओ, या मुझे तो ये वाला विभाग चहिये। न भाजपा में ऐसा कोई सूरमा है, न ही सहयोगी दलों में। चूँकि

अकेली भाजपा ही ३०० के पार जा पहुंची है। इसीलिए सहयोगी दलों के पास भी बार्गेनिंग की कोई गुंजाइश नहीं बची। हाँ अगर भाजपा २५० पर आकर अटक जाती तो अकालियों का अलग राग होता, शिवसेना अपनी आदत के अनुसार छत पर चढ़कर चिला रही होती, और जगनमोहन रेड्डी अपने आंध्रप्रदेश के लिए चंद्र बाबू नायडू की तरह विशेष राज्य का दर्जा मांग रहे होते। बहरहाल मंत्री पद हो या विभाग, मोदी जिस को जो भी विभाग दे देंगे, वह उसी को मान जायेगा। या यूँ कहें कि मानना उनकी मजबूरी है। जहां तक जीत के बाद के मोदी के भाषणों का सवाल है, वो पहले से ज्यादा मुलायम और परिपक्व लग रहे हैं। शायद ये २०२४ के चुनावों की तैयारी है। निश्चित ही यही सब कुछ चलता रहा, तो
२०२४ भी मोदी के लिए दूर नहीं है।
जय हिन्द

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