चाणक्य सरीखा रणनीतिकार …



वर्ष २०१९ में देश के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से बीजेपी को जीत दिलाने में सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम उभर कर सामने आता है, और वो है, मोदी के आधुनिक चाणक्य यानी रणनीतिकार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह।

जिनके सामने सारे राजनीति के पंडित बगलें झाँकने को मजबूर हो गए। ये इनकी रणनीतिक कौशल का ही कमाल है कि इनके सामने सभी पार्टियों को मुंह की खानी पड़ी है, और उनकी जातिवाद की राजनीति को इन्होने धत्ता देते हुए अकेले बीजेपी को चुनावों में ३०३ सीटें दिलवाई, और साथी पार्टियों के साथ ३५३ सीटें दिलवाई।
अमित शाह :
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का जन्म मुंबई २२ अक्टूबर १९६४ में ब्यवसायिक परिवार में हुआ। परिवार में पिता पीवीसी पाइप्स का बिजनेस करते थे। परिवार का राजनीति से दूर तक कोई संबन्ध नहीं था। अमित शाह १४ साल की कुमार

अवस्था में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। उनकी नरेंद्र मोदी से पहली मुलाकात १७ वर्ष की उम्र में ही हो गई थी, पहली मुलाकात में ही शाह ने मोदी को प्रभावित कर दिया था। शाह २२ वर्ष की उम्र में बीजेपी में शामिल हो गए। जब शाह पहली बार मंत्री बने तब उनकी उम्र ३५ की थी। इन्होने छोटे, बड़े २९ चुनाव लड़कर सभी जीते। और जब वे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तब इनकी उम्र ५० की थी। इनकी रणनीतिक कौशल को गुजरात में देखते हुए वर्ष २०१४ लोकसभा चुनाव में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने शाह को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा। उत्तर- प्रदेश जहां पार्टी का जनाधार व पार्टी कार्यकर्ताओं

की सक्रियता लगभग शून्य थी। चुनाव सिर पर थे। शाह ने उत्तर प्रदेश के दूरदराज के गावों, जहां आजादी के कई वर्षों बाद तक भी सड़क सुविधा नहीं थी, व कोई भी पार्टी वहां जाकर खुश नहीं थी। ये वहां उन इलाकों में गए, लोगों से बात की, उनके बीच में रहकर उनको समझाया, पार्टी के लिए प्रचारक तैयार किये, उनको जिम्मेदारी दी गई। इस तरह पूरे प्रदेश में घूम – घूम कर लोगों को पार्टी से जोड़ने में सफल ही नहीं हुए बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी को ७१ सीटें दिलाई, तथा प्रदेश में अपना दल से गठबंधन करके ७४ सीटें प्राप्त करी। ये इनकी रणनीतिक कौशल का चमत्कार ही था।
बीजेपी अध्यक्ष :
२०१४ में शाह को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। अध्यक्ष बनने के बाद शाह ने पार्टी की सदस्य संख्या को तेजी से बढ़ाने का काम करते हुए इसकी सदस्य संख्या १० करोड़ करके विश्व की सबसे बड़ी पार्टी में शुमार कर दिया।
शाह की छवि मेहनती, कठोर व जोखिम लेने वाले नेता की है। व हमेशा जमीन से जुड़कर, वहां रह रहे कार्यकर्ताओं से सम्पर्क में रहते हैं। ये इनकी कठोरता व जोखिम लेने का ही एक उदाहरण है कि इन्होने बात – बात पर शर्तें थोपने, प्रेशर बनाने की राजनीति करने वाली शिवसेना से लगभग २५ वर्ष पुराना संबन्ध तोड़ने में भी देर नहीं लगाई। ये इन्होने बीजेपी के ऊपर अनावश्यक दबाव
डालने की शिवसेना की रणनीति से पीछा छुड़ाने के लिए जरूरी समझकर किया था। इसके बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव
दोनों पार्टियों ने अकेले अपने दम पर लड़े। लेकिन किसी एक को बहुमत न मिलने के कारण दोनों को फिर से सरकार बनाने का फैसला करना पड़ा। पार्टी में टिकट के बंटवारे से लेकर कमजोर प्रत्याशी का टिकट काटना, साफ छवि वाले को प्रत्याशी बनाना इनकी रणनीति का ही एक हिस्सा है। किसी भी बड़े, प्रभावशाली नेता का टिकट काटने में इन्होने संकोच नहीं किया। बीजेपी की शहरी पार्टी की छवि को तोड़कर शाह ने पार्टी के अभियान को दूर गावों – गावों तक पहुंचाया। जिस वजह से पार्टी को २०१९ के चुनावों में गावों से ५७ फीसदी वोट मिले,व शहरों से ५० फीसदी वोट मिले। ये पार्टी के लिए इनकी और से किये गए बहुत
बड़े बदलाव का ही फल था। इसके अलावा इन्होने पार्टी को नई टेक्नोलॉजी से जोड़ा। एक वार रूम की स्थापना की गई, जहां पर कॉल सेंटर बनाकर देश के सभी शहरों से जोड़े गए। वहीं कंट्रोलरूम में घंटों – घंटों बैठकर देश में पार्टी के कार्यकर्ताओं से एक – एक सीट की रणनीति बनाई।
पार्टी का जनाधार पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्व में नहीं था। शाह की ही वजह से त्रिपुरा में बीजेपी शासित सरकार काम कर रही है। और पश्चिम बंगाल में २०१९ के चुनावों में पार्टी को १८ सीटें दिलाई। हालाँकि यहां ममता बनर्जी ने बीजेपी के कार्यकर्ताओं की हिंसा में हत्या करायी। उनको तरह – तरह से डराया, धमकाया गया। दरअसल शाह ने २०१४ से ही वैस्ट बंगाल में पार्टी के लिए

रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। यदि बंगाल में स्वस्थ माहौल में चुनाव होते तो ये आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता था। इसमें कोई दो राय नहीं। शाह देश के सभी बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं और नेताओं से सम्पर्क में रहते हैं। उनका फोन जब भी देश के किसी नेता, कार्यकर्त्ता से सम्पर्क के लिए मिलता है, तो पहला शब्द यही होता ‘ दोस्त बोल रहा हूँ ‘,.शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बात पार्टी तक पहुंचने के लिए एक विश्वनीय सिस्टम तैयार करवाया, ताकि पार्टी के कार्यतर्ताओं को दिल्ली न पहुंचना पड़े। वो अपने कौशल के कारण ही मोदी के सबसे विश्वनीय हैं। ये शाह की सादगी व खर्चों का सही इस्तेमाल करने का परिणाम है, कि वो जब भी कहीं यात्रा पर जाते हैं तो होटल में न ठहर कर किसी सर्किट हाउस या कार्यकर्त्ता के घर पर रहना पसंद करते हैं। इस बारे में इनका मानना है कि ऐसे में उनसे उनकी मन की बात जानने में आसानी होती है। व समस्या का समाधान भी होने में मदद मिलती है। २०१९ के लोकसभा चुनाव में मोदी देश में जगह – जगह जाकर रैलियां कर रहे थे, ये वॉर रूम में घंटों-घंटों देशभर के दर्जनों युवा कार्यकर्ताओं के साथ रणनीति तैयार करते थे, व खुद भी रैलियां करते थे। शाह जरूरी होने पर ही चार्टेड प्लेन्स का इस्तेमाल हैं। आगे होने वाले चुनावों की पृष्ठिभूमि पहले ही तैयार कर लेते हैं। यही कारण है
२०१९ के लोकसभा चुनावों में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला।

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