श्री हेमकुंट साहिब जी की यात्रा व दर्शन ….


१ जून से शुरू होगी यात्रा :

इन दिनों झुलसती गर्मियों में यदि आपका यात्रा का मूड बने, तो श्री हेमकुंट साहिब की यात्रा  करने का प्रोग्राम बनाना न भूलें। यहां की यात्रा न केवल

चिलचिलाती  धूप की गर्मी से निजात दिलाएगी बल्कि आपको एक ऐतिहासिक गुरूद्वारे को करीब से दर्शन करने का मौका भी प्रदान होगा। इसके अतिरिक्त यहां के प्राकृतिक खूबसूरत, मनोरम दृश्य व सुंदर निर्मल जल की झील आँखों व मन को सकून देने के लिए काफी हैं। यहां  की यात्रा आपको यादगार व रोमांचक  पलों का अनुभव कराएगी।

आइये जानते हैं श्री हेमकुंट साहिब के बारे में क्या और क्यों है खास —

हेमकुंड एक संस्कृत नाम है, जिसका अर्थ है – हेम (“बर्फ”) और कुंड ( “कटोरा”) है. दशम ग्रंथ के अनुसार, यह वह जगह है जहां पांडु राजा अभ्यास योग करते थे, इसके अलावा दशम  ग्रंथ में यह कहा गया है कि जब पाण्डु हेमकुंड पहाड़ पर गहरे ध्यान में थे, तो भगवान ने उन्हें सिख गुरु गोबिंद सिंह के रूप में यहाँ पर जन्म लेने का आदेश दिया था।

उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमालय की चोटियों की गोद  में स्थित १५ हजार २०० फ़ीट ऊँचे दुर्गम जगह में यह पवित्र गुरुद्वारा हर सुविधाओं से युक्त है।

हिमालय में स्थित गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब सिखों के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। यहाँ पर सिखों के दसवें और अंतिम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पिछले जीवन में ध्यान साधना की थी,  और वर्तमान जीवन लिया था। 

सिख इतिहासकार-कवि भाई संतोख सिंह (1787-1843) ने इस जगह का विस्तृत वर्णन दुष्ट दमन की कहानी में अपनी कल्पना में किया था,  उन्होंने इसमें गुरु का अर्थ शाब्दिक शब्द ‘बुराई के विजेता’ के लिए चुना है।

इस जगह को  क्षेत्र के स्थानीय निवासियों द्वारा बहुत ही असामान्य, पवित्र, विस्मय और श्रद्धा का स्थान माना जाता है। यहाँ पर स्थित झील और इसके आसपास के क्षेत्र को लोग एक नाम “लोकपाल” से जानते हैं, जिसका अर्थ है लोगों का निर्वाहक।

सच तो यह है कि हेमकुंड साहिब का गुरु गोबिंद सिंह की आत्मकथा में उल्लेख किया गया था. मगर इस जगह का दो से अधिक सदियों से गुमनामी में बने रहने का इतिहास है। इस स्थान के मौजूद होने का संकेत गुरु गोबिंद सिंह जी ने स्वयं दिया था।

यह जगह सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी (1666-1708) के लिए समर्पित है।

सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, ये सात पर्वत चोटियों से घिरा हुआ एक हिमनदों झील के साथ 4632 मीटर (15,197 फीट) की ऊंचाई पर हिमालय में स्थित है।  इसकी सात पर्वत चोटियों की चट्टान पर एक निशान साहिब सजा हुआ है।  यहां पर गोविन्दघाट से होते हुए ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग पर जाया जा सकता है. गोविन्दघाट के पास मुख्य शहर जोशीमठ है।

हेमकुंड की खोज :

पंडित तारा सिंह नरोत्तम जो उन्नीसवीं सदी के निर्मला विद्वान थे. हेमकुंड की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने वाले वो पहले सिख थे. श्री गुड़ तीरथ संग्रह में जो 1884 में प्रकाशित हुआ था, में उन्होंने इसका वर्णन 508 सिख धार्मिक स्थलों में से एक के रूप में किया है.

बहुत बाद में प्रसिद्ध सिख विद्वान भाई वीर सिंह ने हेमकुंड के विकास के बारे में खोजकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

राजा पांडु की तपस्या और हेमकुंड :

भाई वीर सिंह का वर्णन पढ़कर संत सोहन सिंह जो एक रिटायर्ड आर्मीमैन थे, ने हेमकुंड साहिब को खोजने का फैसला किया. वर्ष 1934 में वो सफल हो गया।

राजा पांडु की तपस्या और हेमकुंड पांडुकेश्वर में गोविंद घाट के पास संत सोहन सिंह ने स्थानीय लोगों के पूछताछ के बाद वो जगह ढूंढ ली जहां राजा पांडु

ने तपस्या की थी और बाद में झील को भी ढूंढ निकला जो लोकपाल के रूप विख्यात थी।

हेमकुंड साहिब की सरंचना

1937 में गुरु ग्रंथ साहिब को स्थापित किया गया, जो आज दुनिया में सबसे ज्यादा माने जाने वाले गुरुद्वारे का स्थल है।

1939 में संत सोहन सिंह ने अपनी मौत से पहले हेमकुंड साहिब के विकास का काम जारी रखने के मिशन को मोहन सिंह को सौंप दिया.गोबिंद धाम में पहली संरचना को मोहन सिंह द्वारा निर्मित कराया गया था।

सात सदस्यीय कमेटी :

1960 में अपनी मृत्यु से पहले मोहन सिंह ने एक सात सदस्यीय कमेटी बनाकर इस तीर्थ यात्रा के संचालन की निगरानी दे दी।  आज गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब के अलावा हरिद्वार, ऋषिकेश, श्रीनगर, जोशीमठ, गोबिंद घाट, और गोबिंद धाम में गुरुद्वारों में सभी तीर्थयात्रियों के लिए भोजन और आवास उपलब्ध कराने का प्रबंधन इसी कमेटी द्वारा किया जाता है।

श्री हेमकुंट साहिब, ऋषिकेश से जोशीमठ – बद्रीनाथ रोड के जरिये पहुंचा जाता है। और जोशीमठ – बद्रीनाथ मुख्य रोड से लगभग २२ कि मी पथरीले रास्तों से होकर जाना होता है।

यहां साल का  अधिकतम समय बर्फ, वर्षा और ठंडी हवाओं के चलते सर्दी भरा होता है।  

मई के महीने में यहां का टेम्प्रेचर १० डिग्री से २१ डिग्री के बीच होता है।

वैसे तो यहां की यात्रा हर वर्ष २३ मई को शुरू हो जाती है। लेकिन इस वर्ष अधिक और देर तक बर्फबारी होने की वजह से १ जून से शुरू की जा रही है।

हवाईजहाज से

कैसे पहुंचें —

हवाईजहाज से :

हेमकुंड साहिब के लिए टेक-ऑफ पॉइंट ऋषिकेश से लगभग 275 किलोमीटर दूर गोविंदघाट शहर है। 13 किलोमीटर का ट्रेक घांघरिया गाँव (जिसे गोविंदधाम भी कहा जाता है) के सुगम मार्ग के साथ है। इस रास्ते को पैदल या टट्टू की सवारी द्वारा कवर किया जा सकता है। पत्थर के मार्ग की 6 किमी की कठिन सतह पर 1,100 मीटर (3600 फीट) की चढ़ाई हेमकुंड की ओर जाती है।

 ट्रेन से

आप दिल्ली से, हरिद्वार के लिए ट्रेन ले सकते हैं, और फिर ऋषिकेश होते हुए गोविंदघाट जा सकते हैं। यहाँ से, एक घांघरिया गाँव के साथ एक ट्रेक शुरू करता है। यह 13 किमी का रास्ता या तो पैदल चलने या टट्टू की सवारी के माध्यम से कवर किया जासकता है। इसके बाद, एक और 6 किमी का पथरीला रास्ता (3600 फीट) हेमकुंड तक पहुँचा जा सकता है। हाल ही में, गोविंदघाट

और घांघरिया के बीच हेलीकाप्टर सेवा भी शुरू की गई है जिसमें लगभग 5 मिनट लगते हैं।

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