बॉलीवुड के स्टार्स द्वारा निभाई गयी, यादगार फादर की भूमिकायें …


पहली सीरीज..

१..  राजकपूर के साथ सफल जोड़ी के रूप में कई मूवी करने के बाद और उनसे मतभेद के बाद अलग हो चुकी नरगिस के पास मेहबूब खान की मदर इंडिया में माँ की भूमिका में अपने को साबित करने का सुनहरा मौका हाथ लग गया। नरगिस ने अपने जानदार अभिनय के दम पर सफल नायिका के रूप में अपने को
साबित करने मौका नहीं गंवाया। और उन्हें प्रतिष्ठित कार्लोवी वैरी फेस्टिवल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।

मदर इंडिया  मूवी में सन १९५७ में नरगिस ने दो बेटों सुनील  दत्त और राजेन्दर कुमार की मां का किरदार निभाया था।  ये नरगिस की जिंदगी की अभिनय के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुई। 

२.. पृथ्वीराज कपूर की सन १९६० में  मुग़ल-ए-आज़म निस्संदेह उन सभी फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ थी, जिनमें

पृथ्वीराज कपूर ने पिता की भूमिका निभाई थी। वह मुगल सम्राट, अकबर के रूप में अपने चरित्र के साथ

पूरा न्याय करता है, जिसे विद्रोह के लिए अपने बेटे से लड़ना पड़ता है। पृथ्वीराज कपूर के अभिनय को मुगले आजम में कोई नहीं भूल सकता।

३.. अपने दौर के हिट हीरो शम्मी कपूर की मूवी अंदाज १९७१ में रिलीज हुई थी।  उसमें शम्मी कपूर ने एक लड़की के यादगार पिता का ऐसा रोल किया था।  हालाँकि अंदाज़ मूवी जिस समय रिलीज हुई थी, उस समय शम्मी का कैरियर ढलान पर था।  इस मूवी में ‘ जिंदगी एक सफर है सुहाना ‘ जिसे किशोर

कुमार की आवाज में राजेश खन्ना के ऊपर फिल्माया गया था। ये मूवीज अपने समय की सुपर हिट साबित हुई।   

४ .. अशोक कुमार (आशिर्वाद 1968): आशिर्वाद पिता-पुत्री के बंधन की एक दिल दहला देने वाली कहानी है। हृषिकेश मुखर्जी की निर्देशन में बनी आशीर्वाद मूवी

अशोक कुमार की  एक चरित्र अभिनेता के रूप में सर्वश्रेष्ठ फिल्म है,  जिसके लिए उन्होंने फिल्मफेयर (1970) सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीता।

 संजीव कुमार (कोशिश 1972): संजीव कुमार उन चंद अभिनेताओं-सितारों में से एक थे जिनके लिए

भूमिका का मतलब दुनिया की किसी भी चीज़ से अधिक था। वह किसी  भी मूवी में, उम्र के किसी भी

पड़ाव में  कोई भी किरदार निभाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। एक अभिनेता के रूप में उनके बेहतरीन

अभिनय के लिए मूवी कोशिश, जिसने उन्हें अपना दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार (पहली बार दस्तक  के लिए) जीता था। उन्होंने बहरे और गूंगे व्यक्ति की भूमिका निभाई और संवाद की मदद के बिना

उन्हें अपनी भावनाओं का अनुकरण करते देखना अद्भुत है। फिल्म में उनका अभिनय बहुत ही

बेहतरीन है। वह दृश्य जहां वह सोचता है कि उसका बच्चा भी बहरा है क्योंकि वह किसी खड़खड़ाहट
का जवाब का जवाब नहीं दे रहा है, जहां वह अपने बेटे को एक विकलांग लड़की से शादी करने से इंकार करने

के लिए प्रेरित करता है।

ऐसी ही संजीव कुमार की मूवी नया  दिन नई रात में उन्होंने एक, दो नहीं पुरे नो रोल में अभिनय की

अमिट छाप छोड़ी थी।

बाकी अगली सीरीज…

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