नेताओं की फिसलती जुबान


पिछले पेज का शेष …..

यूँ ही दरकिनार कर  के चैन से बैठ सकती थी …..हाँ .. ये तो है मैंने पंडित जी को एक शिष्य की तरह सहमति जताई। लेकिन पंडित जी एक बात तो बताओ,    पिछली यू पी ए सरकार में  पवन बंसल ने रेल मंत्री रहते हुए नब्बे  लाख रुपए के रिश्वत के आरोप में फंसने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा  देना पड़ा था,   क्या बना। अबे बच्चू  तपाक से मेरी  और देखते हुए  सिर पर हमेशा की तरह फेरते हुए पंडित जी  बोले हुए, तू नहीं समझेगा  … ये राजनीति है। पार्टी में बहुत सोच समझकर टिकट के  बंटवारे होते हैं।  

अच्छा  पंडित जी एक बात बताओ, अपने यू टर्न बाबू का क्या बना  सुना है,  वो ..? वो क्या पंडित जी मेरी बात  को हमेशा की तरह बीच में रोकते हुए बोले।  वो भी कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए उतावले थे, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित से तो  मीटिंग भी कर  ली थी, अपने राहुल से भी मिल लिए थे।

और बात बनकर टूट गयी।  टूट गयी…..? मैंने  बीच में टोकते हुए पूछा।   पंडित जी बोले, उनका नाम यू टर्न ऐसे थोड़े ही पड़ गया, …. रख दी होगी कोई सीटों की गिनती की अनमनी शर्त। बात ना बनने पर हो गए यू टर्न। सोचा, चलो आज बहुत बातें हो गयी,  पंडित जी भी थक गए होंगे, अब अलविदा कहने में ही भलाई है।  हमने फिर से अगले दिन मिलने के वादे से, एक दूसरे से विदाई ली।  

अगले दिन …. और सुनाओ,   पंडित जी कैसे हैं, उनके घुटनों को हाथ लगाते हुए पूछा। पंडित जी को न्यूज़ पेपर में पूरी तरह से  डूबे होने पर मैंने फिर दोबारा से पूछा।  पंडित जी ने पूरी लाइन पड़ने  के बाद बाद मेरे को देखा, और बोले कैसे हो बच्चू।  आपकी कृपा से मैं ठीक हूँ  पंडित जी। पंडित जी और सुनाओ यू पी में क्या चल रहा है। यू  पी में …? अपने सिर के बालों में हमेशा की तरह अपनी उँगलियाँ फेरते हुए बोले, एक कहावत है, जब कहीं कुछ ना रह जाये अपने पास, तो समय के साथ हो लो। यानि भागते चोर की लंगोट ही सही।  जब बात हो मुलायम जैसे   घाघ नेता की, तो पहले तो उन्होंने पुत्र अखिलेश को मायावती से गठबंधन को लेकर मीडिया में बयान देकर बड़ा भला – बुरा कहा, जैसे कि अखिलेश ने पार्टी का नाश कर  दिया है। उसके बाद मौके की नजाकत को समझते हुए पूरे  २४ साल बाद  पहुंच गए पुराने गिले  शिकवे भुलाकर, वो भी  अपनी घोर शत्रु मायावती के पास मंच साँझा करने।  आखिर संसद भी तो पहुंचना है। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा …  हाँ वो तो है, साथ ही मुलायम ने ये भी तो एलान कर दिया, कि ये मेरा आखिरी चुनाव है। सुनकर  पंडित जी मेरी और देखकर बोले, कल की किसने देखी।  मैं भी समझ गया पंडित जी ऐसे थोड़े  ही

बोलते हैं कि ये बाल  धूप

में सफेद नहीं हुए। अच्छा पंडित जी अखिलेश ने पिछले चुनाव में राहुल गाँधी से गठबंधन किया था, और अबकी बार मायावती से, कुछ समझ नहीं आया। अब इसमें समझने वाली क्या बात है बच्चू, एक बात

को गांठ बांध ले राजनीति सुविधा और मौके की होती है, इसमें कोई परमानेंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता। 

पंडित जी रामपुर में आजमखान ने उनके खिलाफ बी जे पी के टिकट से खड़ी जयाप्रदा के बारे में क्या अनाप शनाप बोलकर सारी  मर्यादाएं ही तोड़ दी।   सुनकर पंडित जी बोले अबे बच्चू इतनी गर्मी है नेताओं की जुबान नहीं फिसलेगी

तो क्या जानवर की फिसलेगी। और इसी बहाने  उन्होंने अपने शत्रु अमर  सिंह पर  निशाना भी तो साधना था।  हाँ, हाँ याद आया, चुनाव आयोग ने ७२ घंटों का बैन आजमखान पर लगाया है मैंने आदतवश बीच  में टांग अड़ाते हुए बोला।

उससे  क्या होगा पंडित जी बोले।  इसी बहाने आजमखान  मौका मिल गया, अपनी  आगे की नई  रणनीति  बनाने के लिए, और समर्थकों से मुलाकात करने के लिए ।   अच्छा  पंडित जी एक इधर हरियाणा की तो कुछ बताओ।  पंडित जी ने एक पल तो मेरी और देखा, फिर बोलने लगे हरियाणा में इनेलो तो ताश के पत्तों की तरह वैसे ही बिखरी पड़ी है, हालाँकि कुछ दिन पहले चौटाला साहब को बिना शर्त कोर्ट से जमानत मिल गयी है, अब ये उनपर निर्भर करता  है कैसे वो बिखरे पत्तों को इकठ्ठे करते हैं, और खेलते

हैं। वैसे भी गुजरते समय को कोई नहीं रोक पाया। रही कांग्रेस की बात तो उसके रंग भी यहां प्रदेश में अभी नजर नहीं

आ रहे हैं, एक बात करनी थी पंडित जी, खट्टर जी ने बाबा राम रहीम के चेलों पर कंट्रोल करने में नाकाम रहे, बच्चू तू नही समझेगा, हमारे देश में वोटों की राजनीति है, मैंने पूछ ही लिया बीच में पंडित जी को, पंडित जी मैं समझा नहीं, अबे बच्चू इसमें समझने वाली कोई बड़ी बात नहीं है, सभी पार्टीयां इन्हीं बाबा के पास चुनावों के दिनों में नतमस्तक होते हैं, अब इब बाबाओं का आशीर्वाद जिस पार्टी को मिलेगा, उनके भक्त उन्हीं पार्टी को अपने वोटों से जीता देंगे। बाकी रही खटटर जी की बात, शुरू शरू में उन्होंने  नौसिखिये की तरह गलतियां करी, जैसे कि बाबा रामरहीम

के चेलों से वक्त रहते न सुलट पाना, जिसका परिणाम जगह जगह आगजनी की खबरें आदि जैसी घटनाएं घटित हुई।

लेकिन बाद में उनहोंने अपने शांत, ईमानदार और  दृड़ता वाली छवि बनाई, जिसके परिणाम उनके पक्ष में आ सकते हैं। बाकी जनता का मूड है कब, किस नेता की जुबान फिसल जाये और हवा का रुख पलट जाये।

पंडित जी आपने  राहुल गाँधी के बारे में नहीं बताया। सुन बच्चू राहुल गाँधी को कैसे भूल सकते हैं, राजनीतिक केंद्र में विराजमान नेता हैं। लेकिन पंडित जी वो जब  भी बोलते हैं, मोदी के ही खिलाफ बोलते हैं और किसी के खिलाफ  ज्यादा

कुछ नहीं बोलते। पंडित जी ने लम्बी साँस ली जैसे कि उनसे कोई टेढ़ा सवाल कर  दिया हो। अब क्या उनके बारे में बताऊं उनकी पार्टी के  सलाहकार उनसे जो बुलवाते हैं, वैसा ही वो बोल देते हैं। पहले उनसे मोदी के खिलाफ रफैल के मुद्दे को

रटने को बोला, वो भी सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर बोलते रहे।  लेकिन जब बी जे पी वाले उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गए, तब  से चुप हैं। औऱ सुन अभी पता चला राहुल सुप्रीम कोर्ट में अपने पिछले गलत बयानों को लेकर माफीनामा देकर आये हैं। अब उनको अपनी गलती का एहसास हो गया होगा। रही बात और पार्टियों के बारे में कुछ नहीं बोलने की, तो तू नहीं समझेगा, अबे बच्चू कल के लिए भी

तो कोई गुंजाईश चहिये। यदि केंद्र में अपना बहुमत न आने पर उनके समर्थन की जरूरत पड़ गयी तो…..अपने सलाहकारो की भी सुननी है। हाँ… ये तो मैंने सोचा नहीं। हाँ सोच ना कल को कुछ भी हो सकता है,  चित भी पट भी। एक बात बताओ पण्डित जी इस तरह से तो राहुल तोता बन गए, जिसने जो सीखा दिया, वैसे ही बोल दिया। चुप कर बच्चू कोई सुन लेगा। मैंने भी चुप रहने में भलाई समझी। एक बात याद आई पण्डित जी अब तो प्रियंका गांधी भी मैदान में कूद गई हैं। हां तो फिर उसमें क्या नई बात है। आखिर ये जागीर उन्ही की तो है। देश की आजादी से लेकर कांग्रेस इसी परिवार पर तो निर्भर है। यदि कल को कांग्रेस की सरकार केंद्र में आ गई, तो प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा

को बी जे पी सरकार द्वारा के दायर केसों से बचाना है।

अच्छा पंडित जी एक बात तो बताओ अपने राहुल गाँधी किसी हिंदू धर्मस्थान में गए, और वहां पर उन्होंने अपने कुर्ते के ऊपर जनेऊ डाल रखा था, तो वो हिन्दू ही तो हैं।  पंडित जी त्योरियां चढ़ गयी, लेकिन मेरी  तरफ एक पल को देखकर बोले,

बच्चू कहा  ना जैसे उन्हें सलाहकार करने को बोलते हैं, तो उन्हें करना पड़ेगा न। शयद उनके ये करने से हिन्दू वोट मिल जाएँ।

मैंने पंडित जी को बीच में टोकते हुए बोला, लेकिन उनके दादा तो मुस्लिम थे।  तो ..? पंडित तपाक से बोले।  यही राजनीति है। मैं कुछ समझा नहीं पंडित

जी। अरे बच्चू इसमें समझने वाली क्या बात है, आखिर

हमारा देश धर्म निरक्षेप जो है, वो भी इनकी मेहरबानी की बजह से। तो यदि मुस्लिम होने के बाद हिन्दू भी कहलाएं तो इसमें क्या बुराई है, आखिर वोट भी तो लेने हैं। समझ गया पण्डित जी दूर की कौड़ी जो लेकर आते हैं आप। ठीक ठीक है ज़्यादा चापलूसी न कर। अब चलने का समय हो गया है। बाकी कुछ बाद के लिए भी रख ले। ठीक है पण्डित जी आगे फिर मिलेंगे कुछ नई बातें करेंगे, जय हिंद।

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