नेताओं की फिसलती जुबान….


जी हाँ ये लोकतंत्र  है, गोयाकि …. जैसे बमुश्किल मौका मिला हो, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए, वो भी पुरे पांच साल बाद, जैसे कि यहां कोई प्रतियोगिता हो रही हो। देखते हैं … कौन आगे निकलता है, अरे भाई निकलना तो है ही, कुछ  छिटक कर  बाहर की  और,  और कुछ अंदर संसद में पास होकर। अब इनमें कौन भाग्यशाली होगा, इसमें पूछने वाली कौन सी बात है, ये तो जनता के मूड पर निर्भर  है।  ऐसे थोड़े ही न ‘ ऱोटी ‘मूवी  में गाना  था ‘ ये जो   पब्लिक है, सब जानती है ‘।

आजकल देशभर में नेताओं के एक  दूसरे पर शब्दों के बाण चल  हैं। सोचा कि अपने  पुराने राजनीति के पंडित, हाँ, हाँ पंडित ही तो हैं, सालों से चुनावों में  यही शब्दों के  बाणोँ की बौछार एक दूसरे  की और देखते सुनते आज वो साँझ वेले में जो पहुंच  गए हैं। कई बार  उनसे कोई सवाल गलती से कर  भी लें, तो उनका यही तकिया कलाम होता..अरे बच्चू  तुम हमें समझते क्या हो, हमारे सफेद बाल यूँ ही थोड़े ही हो गए …..  घाट- घाट का पानी पिया है  हमने, पता नहीं कितने  चुनाव  देखे हैं।  कई नेता नेता आये और गए। हम भी वही  पुराने लहजे से उनको ऐसे देखते, जैसे भाई  तुम ही ज्ञानी पंडित हो, हमें तो वैसे ही आदत सी पड़ गयी है तुम्हे छेड़ने की। ऐसे ही मैं पहुंच गया पंडित जी पास, पंडित जी

न्यूज़ पेपर में बुरी तरह रमे पड़े थे। हमने झुक कर पंडित जी के घुटने को छूते  हुए बोले प्रणाम, पंडित जी।  प्रणाम बच्चू ..  पंडित जी  पेपर में ही रमे हुए बिना देखे  बोले। अच्छा पंडित जी हमें बच्चू कहकर ना बुलाया करो, नाम लिया करो हमारा, आखिर हमारा भी एक सुंदर सा नाम है।  देखो बेटा  रहोगे तो तुम

हमारे लिए बच्चू ही। नहीं हमें यूँ  बच्चू आपके मुंह से पुकारना अच्छा नहीं लगता।  मैंने फिर पंडित जी से  शिकायत की। ठीक है … मैं नहीं आज से तुम्हे बुलाऊंगा, कहते हुए पंडित जी उठकर चल दिए, नाराज होकर मैंने उनकी उम्र, तजुर्बे और समय   की नजाकत को समझते हुए उनको दौड़कर अपने दोनों हाथो से झपी पायी, और

बोला, अच्छा ठीक है, तुमको पूरा हक है मुझे जिस भी नाम से पुकारने का।  अब से तुम्हें बच्चू कहने पर बिलकुल नहीं टोकूंगा। पंडित जी मेरी और मुखातिब होकर बोले, ठीक है, ठीक है।  

चलो छोड़ो अच्छा ये बताओ आज  क्या कुछ नई खबर है।  उन्होंने अपने सिर के  बेतरतीब बालों को  उँगलियों

से करीने से संवारते हुए बोले  अब  क्या बताएं।  पश्चिम बंगाल चले जाओ, वहां पर मजाल जो ममता दी के घर

में अपना, या पार्टी का इश्तिहार  लगा दे, सुबह का लगा शाम को लगा मिल जाए, तो बोलना। कोई उनसे सीखे

कैसे अपने शासन और पार्टी पर  पकड़ मजबूत करनी होती है, मजाल जो उनके सामने चाहे कोई अफसर या पार्टी का अदना सा सिपाही।  यहां तक  कि चुनाव आयोग का ही एक अफसर बी जे पी के बैनर को अपना मुंह छिपाते

हुए दीवारों से हटा रहा था, किसी मीडिया वाले ने देख लिया, उससे उसकी हरकत के बारे में सवाल किया तो उसने कैमरे से अपना मुँह छिपाते हुए कहा कि ये  सरकारी इमारत की दिवार है, लेकिन उसी इमारत की दूसरी दिवार पर

जिस पर ममता दी की पार्टी टी एम् सी का बैनर लगा था, तो वो वहां से निकल  लिया। अरे हाँ ये वीडियो तो चैनल वाले लगातार सारे दिन दिखाते  रहे। मैंने बीच  में इनको रोकते हुए बोला। पंडित जी फिर बोले आज उनके राज्य में कोई

परिंदा भी उनकी मर्जी के बिना   पंख  नहीं फड़फड़ा सकता। हाँ ममता दी यदि चाहे तो पड़ोसी देश से भी अपनी पार्टी के प्रचार के लिए, किसी को भी बुला  सकती है। अच्छा जी मैने पूंछा, हाँ हाँ याद आया, मैंने  बीच में पंडित जी को   रोकते हुए कहा।  ये खबर

मैंने भी पड़ी थी, कैसे बंगलादेशी  अभिनेता ने ममता दी के लिए प्रचार किया और वह  भी वीजा अवधि खत्म होने के बावजूद। तो देखा बच्चू पंडित जी  सिर पर हाथ फेरते हुए बोले। वो तो बी जे पी वालों को पता चल गया, तो उन्होंने

उनको देश छोड़कर जाने को बोला गया।  अब यदि केंद्र सरकार से कोई ये पूछे कि इनकी इंटेलिजेंस क्या कर रही थी। ममता दी ने मोदी को अपने भाषण में  साफ शब्दों में कह दिया है, कि मोदी बाबू तुम्हें अबकी बार चुनाव परिणाम में

रसगुल्ला मिलेगा। रसगुल्ला ? मैंने पूछा, कुछ समझा नहीं, अरे इसमें समझने वाली क्या बात है, रसगुल्ला मतलब जीरो, शून्य। पंडित जी बोले। और तो और  उसने अपने लोगों  के द्वारा बी जे पी के एक एक पार्टी वर्कर को चुन चुन मारा, धमकाया, ताकि उनकी हिमत न पड़े प्रचार, रैली करने की। अच्छा  छोड़ो पंडित जी ये बी जे पी के करीब तीन दशक से चले आ रहे शॉटगन बाबू  यानि सिन्हा अपनी पार्टी से पूरे  कार्यकाल से खुश नहीं चल रहे थे, कभी वो कुछ  भी बोल देते थे,  जैसे कि उनके लिए वही  समय चुनाव का चल रहा हो। पार्टी भी उन्हें झेलती रही , और अब तो बी जे पी ने उन्हें पटना से टिकट न देकर अपनी नाराजगी  जाहिर कर दी, उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम  लिया है। पंडित जी से चुप नहीं रहा गया बीच  में ही तपाक  से बोले,  वो दूसरी पार्टी में अब कौन से नए गए हैं, पिछले पांच सालों से वो उन्ही के ही तो साथ उठते  बैठते हैं, भूल गए बच्चू कभी लालू, तेजस्वी, यशवंत सिन्हा, ममता दी, तेजस्वी यादव या केजरीवाल या बी जे पी के खिलाफ जो भी उन्हें नजर आता उसी  के साथ हो लेते, उनके गुणगान गाने लगते, और ये सभी पार्टियां उन्ही की तो हैं। और कभी भी कुछ भी बोल देना  ये तो उनकी पुरानी  आदत है, ऐसे थोड़े ही उनका नाम शॉटगन पड़ा हुआ है। और ये सभी पार्टियां उन्ही की तो है। अब कल की ही ले लो, अपने आप उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की, और अपनी पत्नि को समाजवादी पार्टी से टिकट दिलवा कर,  लखनऊ में राजनाथ के खिलाफ पर्चा दाखिल करवाने चले गए, किसी रिपोर्टर ने

उनसे लखनऊ में पूछ ही लिया कि आपने  तो आज  पटना में अपना पर्चा दाखिल करने जाना था, आज यहां कैसे, तो सुना ? शत्रुघ्न सिन्हा का क्या जवाब था, नहीं मैंने नहीं सुना।  पंडित जी फिर मेरी और मुखातिब होते हुए बोले, शत्रुघ्न सिन्हा ने

उस रिपोर्टर से कहा  मेरे लिए पहले परिवार है, पार्टी बाद में। ये तो गलत बोल दिया मैंने बीच में अपनी टांग  अड़ाते  हुए पंडित जी से कहा। कांग्रेस के किसी नेता ने उन्हें कोई  ताकीद नहीं  दी..? जाओ यहां हमारी पार्टी में क्या कर रहे हो।  अपने परिवार में जाओ। पंडित जी ने मेरी तरफ ऐसे घूरते  हुए देखा, जैसे कि मैंने कोई गलत बात कर दी हो, मैंने मोके की नजाकत को समझते हुए अपना ध्यान इधर उधर भटकाने  की कोशिश की। पंडित जी फिर नॉर्मल होकर बोले, ये कांग्रेस वालों की क्या मजाल जो शत्रु के खिलाफ कुछ भी बोल  दे। पटना की सीट नहीं चहिये ? हँस पड़ा मैं, पंडित जी का जवाब सुनकर। याद आया वो वाकया, जब अरुण जेटली ने शत्रु के  कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद कहा था, बधाई हो कांग्रेस में जाने की, आज से हमारी सिरदर्दी उनकी हुई। हंसते हुए मैंने पंडित जी से फिर एक सवाल किया , अच्छा पण्डित जी ये तो बताओ कि अपने शॉटगन बी जे पी वालों से क्यों नाराज थे । अबे बच्चू इसमें समझने वाली क्या बात है, एक अंधे को क्या चाहिए , दो नैन। यदि बी जे पी वाले उन्हें मंत्री बना देते

बस फिर क्या था, खुश रहते ।जुबान का भी रंग बदल होता । पंडित जी मुझसे बोले अब समझे बच्चू, कैसे नेताओं की जुबान और जमीर वक्त के साथ रंग बदल जाते हैं।तभी तो उनकी जुबान फिसलने में समय नहीं गंवाती। अच्छा  पंडित जी अब सिद्धू जी भी कुछ चर्चा जाए। पंडित जी बोले भूल गए बच्चू, पिछले २०१४ के  लोकसभा चुनावों में उन्होंने बी जे पी के द्वारा अमृतसर से उन्हें टिकट न देकर उनका टिकट अरुण जेटली को देने पर चले गए थे कोपभवन में।  बी जे पी ने सिद्धू को कोपभवन से निकलने के लिए बड़ा लाड लड़ाया, उन्हें कुरुक्षेत्र

से भी टिकट का प्रलोभन दिया गया, लेकिन सिद्धू ऐसे नाराज हुए पार्टी से, अपनी सुविधा अनुसार पार्टियां ढूढ़ने लगे, कभी उनकी चर्चा आम आदमी पार्टी में जाने की हुई, लेकिन पार्टी में बड़े ओहदे को लेकर पेंच  फंस गया, अब जाना तो था, अपने रुतबे को  बचाने को लेकर किसी पार्टी में, कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी पार्टी थी नहीं मैदान में, सो हो लिए उसी में। अपनी

आदत से मजबूर मैं  बीच  में फिर से टपकते हुए बोला, लेकिन आप तो पंडित जी एक बार  बोल रहे थे कुछ समय सिद्धू पार्टी के

साथ रहे।  हाँ मैं कौन  सा अब मुकर रहा हूँ।  उन्होंने पार्टी की तरफ से प्रचार भी किया था। याद है। .?  एक बार दिल्ली में मोदी

के साथ मंच साँझा करते हुए सिद्धू ने कांग्रेस को लेकर बोला था, कांग्रेस मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम हो गयी है। और आज देख लो उन्ही  सिद्धू  की  जुबान मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम पार्टी में  रहकर मोदी के खिलाफ कैसे फिसल रही है। मैंने पंडित जी को आदतवश  बीच में फिर से  टोकते हुए कहा, अच्छा  पंडित जी ये तो बताओ अभी पिछले दिनों सिद्धू की पत्नि चंडीगढ़ में कांग्रेस  पार्टी का टिकट का टिकट लेने के लिए डेरा जमाये बैठी थी, बैठी क्या थी ……टिकट मिल गया बच्चू … ? पंडित जी ने मेरी और  तल्खियों से देखा, चंडीगढ़ से कांग्रेस का टिकट लेने के लिए तो मनीष  तिवारी भी बैठा था। अच्छा एक  बात बता

चंडीगढ़ में जो पुराने पवन बंसल जैसे घाघ जिहोने राजनीति  में वर्षों गुजार दिए तू क्या समझता हे कांग्रेस पार्टी उनको यूँ ही दरकिनार कर  के चैन से बैठ सकती थी …..हाँ .. ये तो है … मैंने पंडित जी को एक शिष्य की तरह सहमति जताई। लेकिन  पंडित जी एक बात तो बताओ,   

 बाकि अगले पेज पर कल को

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