सत्ता के लिए पीछे छूटते सिद्धांत…


चुनावों का दौर है , जाहिर है हर पार्टी इस जुगत  में लगी है, किसी तरह वो सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हो जाये।

इसके लिए कई बार पार्टियां अपने लिए सुविधा की  राजनीति  करने से भी गुरेज नहीं करती। इसमें देश की सभी पार्टियां

शामिल हैं। जम्मू कश्मीर को लें, वहां किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए दो अलग विचारधारा के लोग पी डी पी और बी जे पी ने अपने सिद्धांतों को पीछे छोड़ते हुए सत्ता पर काबिज होने में देर नहीं लगाई।

हालाँकि पर्दे के पीछे कांग्रेस, नैशनल कॉन्फ्रेंस दोनों ही पी डी पी से मिलकर सत्ता में आने के रास्ते तलाश रहे थे…। यद्पि ये

आज की बात  नहीं  है।  सन १९८७  में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने तमिल लिटटे की खिलाफ श्री लंका में भारत की शांति सेना भेजी, उस समय पूरे  तमिलनाडु में द्रमुक पार्टी के करुणानिधि ने जमकर कांग्रेस पार्टी का  विरोध किया था। हालाँकि उसके बाद राजीव गाँधी श्री लंका आधिकारिक यात्रा पर भारत श्री लंका शांति समझौते  के लिए गए,

वहां पर गार्ड ऑफ़ ऑनर ले रहे थे कि अचानक सिंहली गार्ड विजिथा रोहाना विजेमुनी ने अपनी राइफल के बट से उनपर हमला कर दिया। उस समय श्री लंका की मूल जाति सिंहलियो के दिलों में तमिल लिट्टे के खिलाफ दहशत ओर गुस्से की भावना प्रबल थी , इसी कारण उस सिंहली गार्ड ने एक तरह से अपनी भावना का प्रदर्शन करते हुए राजीव गांधी पर हमला किया। उस हमलावर का बाद में कोर्ट मार्शल भी किया गया। इस घटना के बाद २१ मई १९९१ में राजीव गाँधी की

श्रीपेरुमपुदुर में आत्मघाती धमाके में इसी कारण हत्या कर  दी गई। इस घटना में शामिल लोग जेल की सजा काट रहे हैं। वही  द्रमुक आज कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में है। लेकिन यहां एक अपवाद है, कि द्रमुक ने  राजीव गाँधी के हत्यारों की रिहाई का वादा किया है, जबकि कांग्रेस पार्टी इनकी रिहाई का विरोध कर  रही है। अब बात करते हैं मुलायम सिंह के

बेटे अखिलेश के बारे में, जब इनकी समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई तो इनकी विरोधी पार्टी में मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी एक थी। सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव ने मायावती के सत्ता काल  के दौरान मायावती  द्वारा बनवाई हाथियों की मूर्तियों के लिए ७०००  हजार करोड़ के स्कैम करने के आरोप में उन पर गंभीर धाराएं कोर्ट में लगाकर उन पर केस दायर किया। अब तो मायावती  पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी पैसों के दुरूपयोग के सिद्ध होने पर मायावती को उक्त पैसा सरकारी खजाने में जमा करने को बोला  है, लेकिन मायावती  ने सुप्रीम कोर्ट में ये कहते हुए पैसे जमा करने से मना कर  दिया है, तथा कोर्ट में अपनी तरफ से ये जवाब दिया है कि किसी भी सरकार   को कोर्ट ये  नहीं कह सकता कि सरकार कहां  पर पैसों को लगाए। ऐसे में

मायावती   ने ये जता दिया है कि उन्होंने सरकारी पैसों  को कहां,  कैसे खर्च करना है, ये सरकार का विशेषाधिकार है। यानि की उन्होंने कोई घोटाला ही नहीं  किया। आज चुनाव में दोनों का गठबंधन है, तथा साथ मिलकर चुनाव लड़ रहें हैं। सवाल उठता है की

जब अखिलेश   यादव ने मायावती पर करोंड़ों के स्कैम करने के आरोप  लगाए थे, उनका क्या बना…?

ऐसे ही एन डी ए का ही एक घटक दल जे डी यू जिनकी पार्टी के सीनियर नेता शरद यादव एन डी ए के संयोजक भी थे। बिहार में जे डी यू और बी जे पी की सरकार थी। बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार व् बी जे पी के उप मुख्य मंत्री शुशील मोदी यानि एन डी ए की सरकार थी। नरेंद्र मोदी की गुजरात में सरकार के दौरान गोधरा दंगे होने से  नरेंद्र मोदी पर साम्प्रयदायिक  दंगे में हाथ होने के आरोप लगे। केंद्र में

वाजपेयी

सरकार थी। दंगों की जाँच बैठा दी गई।  बाद में केंद्र में यू पी ए की सरकार आने पर कांग्रेस सरकार ने दंगों के खिलाफ मोदी के खिलाफ सुप्रीम के जजों की एस आई टी का गठन

किया। उसने  भी बाद में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी। फिर भी नितीश कुमार अपने वोट बैंक और साफ छवि की खातिर, एन डी ए में होने के बावजूद  नरेंद्र मोदी से जहां तक हो सके दूरी बना कर रखते थे । २०१४ में लोकसभा के चुनाव के लिए बी जे पी के प्रेसिडेंट राजनाथ ने  एन डी ऐ के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार के लिए नरेंद्र मोदी के  नाम का एलान किया। नरेंद्र मोदी के नाम

का एलान होते ही नितीश कुमार एन डी ए से अलग हो गए। इसके साथ ही दोनों की सरकार बिहार में गिर गयी। हालाँकि उस दौरान

नरेंद्र मोदी की लहर होने से वो प्रधानमंत्री बने, केंद्र में एन डी ए की पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब हुए ।  उसके बाद बिहार

में विधानसभा चुनाव  के दौरान जे डी यू और बी जे पी एक दूसरे के खिलाफ मैदान में थी। और नितीश कुमार, लालू यादव व कांग्रेस आदि जिनके खिलाफ हमेशा वो जहर उगलते थे, साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाई । लेकिन नितीश कुमार और लालू यादव का गठबंधन वाली सरकार ज्यादा

नहीं चली। और बाद में नितीश कुमार पुनः एन डी ए में शामिल हो गए। और बिहार में फिर से एन डी ए की सरकार बनी। शिवसेना और बी जे पी का गठबंधन बालासाहेब ठाकरे के जमाने से है, और जब से ही एन डी ए में है,  और जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी तो उसमें शिवसेना शामिल थीं । उसके बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हुए तो बी जे पी, शिवसेना  की सरकार बनी थी। बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उनके

सुपुत्र उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे में पार्टी की कमान संभालने के लिए उनका उत्तराधिकारी बनने की होड़ शुरू हो गयी। लेकिन जीत उद्धव ठाकरे की हुई। आज पार्टी की

बागडोर पूरी तरह से उन्ही के हाथ में है। वो भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एन डी ए सरकार में उचित स्थान न मिलने से असन्तुष्ट ही रहे।

महाराष्ट्र में  बाद में विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियां सीटों के बंटवारे को लेकर अलग अलग ही मैदान में उतरी, ओर बाद इनकी सांझी सरकार अस्तित्व में आई । और देवेंद्र फड़नवीस के सत्ता काल  में एक दूसरे के खिलाफ आरोपों की झड़ियाँ ही लगाते  रहे। यद्यपि महाराष्ट्र में इन दोनों की सरकार अभी तक कायम है। उध्दव ठाकरे केंद्र सरकार की पूरे कार्यकाल में उसकी नीतियों की भी आलोचना ही करते रहे। अब लोकसभा चुनाव में दोनों दल फिर साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। अभी पिछले दिनों बी जे पी के प्रेसिडेंट अमित शाह गांधीनगर  गुजरात में अपना नामांकर पत्र भरने गए, तो उद्धव ठाकरे विशेष तौर वहां पर पहुंचे। अब सवाल उठता है, कि जो आरोप वो अपनी ही केंद्र में सरकार पर लगाते  रहे, उनका क्या बना। ऐसा ही एक गठबंधन कर्नाटक में बना। वहां पर पिछले दिनों विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और देवगौड़ा के सुपुत्र कुमारस्वामी

की जे डी एस पार्टियों में  एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोपों की बौछारें हुईं । लेकिन किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाने की वजह से

दोनों दल सरकार बनाने के लिए एक दूसरे के नजदीक आने को मजबूर हुए। हालाँकि कांग्रेस ने कर्नाटक में ज्यादा सीटें जीती, बावजूद

इसके कुमारस्वामी अपनी शर्तों को मनवाने में सफल रहें। और खुद मुख्यमंत्री बने । हालाँकि बाद में यदाकदा कांगेस पार्टी के नेताओं

द्वारा उलटी सीधी हरकतों से कुमारस्वामी तंग भी

हुए हैं। और यदाकदा उन्होंने अपने दर्द का इजहार भी किया , फिर भी ये नापाक गठबंधन कायम है।

इन सभी कार्यकलापों के बीच  लोकतंत्र जिन्दा है।  उसे सलाम ।

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