चुनावी मौसम में जम्मू – कश्मीर का विशेष दर्जा


जब से १७ वीं लोकसभा के चुनावों का बिगुल बजा, तब से हर राजनितिक पार्टियां अपने अपने मैनिफेस्टो को लेकर मतदाताओं को लुभाने में लगी हैं, कोई भी मतदाताओं के बीच पहुंचकर एक दूसरे पर शब्दों के बाण छोड़ने से लेकर चाहे  किसानों के मुददे, गरीबों के बैंक खातों  में हर वर्ष  ७२००० रूपये डालने या  बेरोजगारों को नौकरी देने को लेकर हों आदि आदि। यहां तक तो सब लोकतंत्र में जायज हे।  हर राजनितिक पार्टियों को हमारे संविधान में ये हक हे।

लेकिन देश का बॉर्डर से लगता संवेदनशील राज्य जम्मू – कश्मीर में राजनितिक  पार्टियों के नेतागण चाहे ‘ पी डी पी ‘ की नेता महबूबा मुफ़्ती जिन्होंने केंद्र

में मोदी सरकार को ये कहकर सनसनी फैला दी, की आप धारा  ३७० को हटाने की तारीख  बता दीजिये, हम भी जम्मू – कश्मीर के देश से अलग होने की तारीख बता देंगे। और तो और इस राज्य के पूर्व मुख्य मंत्री  उम्र अब्दुला, जो केंद्र  में भी श्री अटल बिहारी वाजपेई के मंत्री मंडल में मंत्री रह चुके हैं, यहां तक कह दिया है  कि  जल्दी ही जम्मू – कश्मीर का अपना प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति होगा।

दरअसल जम्मू-कश्मीर का सारा विवाद धारा ३७० को लेकर है।  हालाँकि इतिहासकारों के अनुसार (१९४७-४८) के समय की परिस्थियों के मद्देनजर ये आवश्यक हो गया था। इसके बाद २६ जनवरी १९५७ को विशेष संविधान लाग् कर दिया गया। यद्पि जम्मू – कश्मीर की जनता को इससे कोई फायदा नहीं हुआ।  इसके बाद उस समय. और आज के समय के हालत में बहुत अंतर् आ चुका है। पिछले दिनों केंद्र सरकार में धारा ३७० हटाने को लेकर बहस छिड़ी हुई है, यहां तक कि अब तो सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर सुनवाई के तैयार हो गया है।  जम्मू -कश्मीर की पार्टियां अपने अपने सियासी फायदे के लिए इसको मुद्दा बनाकर अपनी अपनी गोटियां फिट करने में लगे हैं।  उनको देश की, उसके हित की कोई परवाह नहीं है।  अब वक्त आ गया है।  देश हित में जो भी उचित

है, उस पर दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए फैसला लिया जाये। चुनाव आयोग को भी देश हित में आगे आकर इन नेताओं के अमर्यादित भाषणों पर रोक लगानी चहिये। आज देश सुरक्षित होगा तो हम सब सुरक्षित होंगे।  जय हिन्द।

 

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