झंडा महोत्सव श्री गुरु रामराय महाराज, देहरादून उत्तराखंड


हैलो दोस्तों आज मैं आपको इसी महीने देहरादून में हिंदू माह की पंचम तिथि ( होली के पांचवें दिन) श्री गुरु रामराय महाराज के झंडा चढ़ने के बारे में बता रहा हूं, इस मौके पर पूरे उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि से श्रद्धालुओं (संगत) का सैलाब उमड़ता है, यहां तक कि देहरादून में पैर रखने की जगह नही होती। इसके साथ यहां पर मेला लगभग दस दिनों तक लगता है, जिसमें बाहर से दुकाने यहां पर लोग लगाने आते हैं। ये झंडा- रस्म के पीछे के इतिहास के बारे में जानते हैं।

देहरादून के नामकरण, स्थापित होने की कहानी भी इसी से जुड़ी है। सिख गुरुओं के सातवें गुरु श्री हर रॉय जी महाराज के सबसे बड़े पुत्र रामराय ने इसी स्थान पर झंडा चढ़ाया था। वर्ष 1676 में चैत्र कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि को श्री गुरु रामराय महाराज ने दून घाटी में डेरा डाला, तभी से दून घाटी का नाम डेरा दून यानि देहरादून पढ़ा।

इस तरह से झंडा उत्सव की शुरुआत हुई। इस झंडा- रस्म की जिम्मेदारी यहाँ के महंत जिनकी गददी व निवास श्री गुरु रामराय गुरुद्वारे में है, के द्वारा निभाई जाती है। वर्तमान में यहां के महंत देवेंद्र दास जो कि 25 जून 2000 से इस गददी पर विराजमान हैं।

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गुरु रामराय का मुगल बादशाह औरंगजेब से सम्बंध या यूँ कहें नजदीकी इनके पिता गुरु हर राय ने इन्हें हमेशा के लिए बेदखल कर दिया, जिस कारण श्री गुरु रामराय जी दून घाटी में आये। औरंगजेब ने उस समय टिहरी सम्राट राजा फतेह शाह को गुरु रामराय जी को 6 गांव देने को बोला था।, उन 6 गांवों में धामावाला, राजपुर, पंडितवाड़ी आदि था। धामावाला जगह पर ही आज श्री गुरु रामराय गुरुद्वारा है, बाद में इसके साथ में बाज़ार का नाम झंडा बाज़ार हो गया। कई लोगों में गलतफहमी है कि ये सिखों का गुरुद्वारा है, असल मे यह स्मारक है, ये बोलचाल में गुरुद्वारा बोला जाता है। यहाँ पर सिख प्रथा को न मानकर उदासीन या उदासी प्रथा को माना जाता है। यही कारण है यहां पर आपको उदासीन परम्परा का साहित्य मिलेगा। इसी कारण से हम गददी पर आसीन महंत प्रथा को देखें तो यहां पर सिख प्रथा के महंत नहीं होते। यहां गददी पर सिर्फ गड़वाली महंत ही गददी पर बैठते हैं, औऱ वे कठिन नियमों से बंधे हुए होने के कारण जिंदगी भर अविवाहित रहते हैं ।

श्री गुरु रामराय की चार रानियां थीं। जिनकी समाधि गुरुद्वारे में चारों कोनों में हैं। गुरुद्वारे में श्री गुरू रामराय जी का पलंग आज भी गुरु ग्रह में ज्यों का त्यों सुरक्षित लगा हुआ है। वहाँ पर पुजारी सुबह शाम आरती-पूजा करते हैं। पुजारी भी गढ़वाली हैं।

श्री गुरु रामराय जी की जीवनी के अनुसार वे अमर हैं, वे अक्सर अपने शरीर को छोड़कर अपने भक्तों के संकट दूर करने चले जाते थे, लेकिन जल्दी आ भी जाते थे।एक बार इसी तरह वे अपने शरीर को छोड़कर गए तो उन्हें वापस लौटने में समय लग गया, उनकी बड़ी रानी पंजाब कौर ने अपने सहायकों से श्री गुरु रामराय जी का दरवाजा खुलवाया ओर देखा कि उनका शरीर मृत अवस्था में पड़ा है, उन्होंने भृम वश उनके शरीर का दाह संस्कार करवा दिया। मान्यतानुसार वे जब वापस आये तो उन्हें उनका शरीर न मिल पाने के कारण वे वहीं पर घूमते रहते हैं, झंडा फहराने के समय वे अपने बाज के रूप में परिक्रमा करते हुए नजर आ जाते हैं। मान्यता- नुसार झंडा साहब में बहुत शक्ति है, उनके पास आकर लोग अपनी मन्नत मांगने आते हैं। तभी इतनी भीड़ वहां पर श्रद्धा से आती है। इनकी शक्ति समारोह मे देखने को सहज मिल जाती है।

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